
रिश्तों की मजबूती के साथ कूटनीतिक संदेश भी देगी पुतिन की यात्रा
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा से दोनों देशों के संबंध और मजबूत होंगे। यह यात्रा वैश्विक कूटनीति में भी महत्वपूर्ण है, खासकर अमेरिका के दबाव को नजरअंदाज करते हुए। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा सहयोग में वृद्धि होगी। चीन भी इस यात्रा पर नजर बनाए रखेगा।
मदन जैड़ा नई दिल्ली। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की यात्रा जहां भारत और रूस के पुराने संबंधों को और प्रगाढ़ बनाएगी वहीं वैश्विक कूटनीति के नजरिये से भी यह यात्रा महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यात्रा के दौरान रूस से होने वाले करार के जरिये भारत का अमेरिका को भी स्पष्ट संकेत होगा कि उसकी विदेश नीति किसी के दबाव में काम नहीं करती है बल्कि राष्ट्रीय हित ही सर्वोपरि है। यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने पर भारत पर टैरिफ लगा दिया है। उधर, रूस और यूक्रेन के बीच अमेरिका की मध्यस्थता में शांति वार्ता महत्वपूर्ण मुकाम पर पहुंच चुकी है।
भारत की तरफ से रूस से तेल की खरीद जारी है तथा परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में नए समझौते के भी आसार हैं। इसलिए इस यात्रा के समय को विशेषज्ञ महत्वपूर्ण मान रहे हैं। जेएनयू में विदेश मामलों के प्रोफेसर अमित सिंह के अनुसार, इस यात्रा के दौरान कई महत्वपूर्ण करार होने जा रहे हैं, जो हो सकता है अमेरिका को रास नहीं आए। उसकी तरफ से प्रतिकूल प्रतिक्रिया भी हो लेकिन भारत की कूटनीति परिपक्वता के साथ उसका जवाब देने में सक्षम है। भारत का संदेश स्पष्ट है कि वह किसी के दबाव में फैसले न तो लेता है और न ही बदलता है। इसलिए तेल खरीद के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा समझौता होने में कोई रुकावट नहीं आएगी। सिंह के अनुसार, एक समय में भारत के पास 90 फीसदी तक रूस से आयातित हथियार होते थे लेकिन अब यह निर्भरता कम हुई है। इसकी मुख्य वजह भारत में भी हथियारों का निर्माण होना है लेकिन रूस से रक्षा सौदे भारत के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं क्योंकि रूस भारत को सिर्फ क्रेता के तौर पर नहीं देखता है बल्कि संयुक्त अनुसंधान और तकनीक का सीमित हस्तांतरण भी करता है। ब्रह्मोस मिसाइल का निर्माण इसका उदाहरण है जबकि अमेरिका ने आज तक कभी भी भारत को तकनीक हस्तांतरित नहीं की। उल्टे तेजस के मामले में जीई इंजनों पर निर्भरता से भारत की मुश्किल बढ़ी है। यात्रा पर चीन की भी रहेगी नजर कूटनीति के जानकारों के अनुसार, इस यात्रा पर चीन की भी नजर रहेगी। भारत और चीन के बीच संबंधों में हाल में सुधार हुआ है। रूस की कोशिश रहती है कि चीन और भारत दोनों से उसके गहरे रिश्ते बने रहें। दूसरे, रूस की यह भी सोच है कि जिस प्रकार खुद उसके चीन से सीमा विवाद के बावजूद रिश्ते प्रगाढ़ हैं, वैसे ही भारत-चीन के भी हों। भारत चीन के संबंधों की सुधार की कवायद भी पिछले साल कजान से ही शुरू हुई थी। चीन की अर्थव्यवस्था चरम पर पहुंच चुकी है जबकि भारत की तेजी से बढ़ रही है, इसलिए रूस भारत को व्यापारिक साझीदार के मामले में कहीं ज्यादा तरजीह आने वाले समय में देगा।

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