थिएटर में पैसा नहीं, ये पागलपन और जज्बे का नाम है : पीयूष मिश्रा
अभिनेता पीयूष मिश्रा ने भारत रंग महोत्सव के दौरान थिएटर के प्रति अपने प्यार और संघर्ष के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि थिएटर में कोई आर्थिक लाभ नहीं है, लेकिन यह संतोष का स्रोत है। एनएसडी के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने रंगकर्मियों की कठिनाइयों के बारे में चर्चा की और एनएसडी द्वारा सहयोग की जानकारी दी।
अभिनव उपाध्याय नई दिल्ली। थिएटर में हम जानते हैं कि पैसे नहीं हैं, उसके बाद हम इसमें में आते हैं। थिएटर पागलपन और जज्बे का नाम है। उक्त बातें शुक्रवार को एनएसडी परिसर में भारत रंग महोत्सव के तहत एनएसडी छात्र संघ की ओर से आयोजित संवाद सत्र ‘कुछ इश्क किया कुछ काम किया’ के दौरान अभिनेता, संगीतकार, गायक एवं निर्देशक पीयूष मिश्रा ने कहीं। एनएसडी के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने पीयूष मिश्रा से बातचीत की। पीयूष मिश्रा ने कहा कि हम सब ने जज्बाती होकर थिएटर किया है। इसमें कोई फायदा नहीं है, जो फायदा है वह सिर्फ हम जानते हैं।
मैं ऐसा नहीं कह सकता कि थिएटर ने मुझे कुछ नहीं दिया, लेकिन जो दिया उसे बता नहीं सकता। उसने मुझे सन्तोष दिया, कुछ फटे हुए टिकट, कुछ बदरंग ब्रोशर दिए। अपने संघर्ष को याद करते हुए उन्होंने कहा कि मुझे जल्दी मुंबई चले जाना चाहिए था। 40 साल की उम्र में अपनी मां, पत्नी और बेटे के साथ बिना काम के मुंबई गया। मैंने सोच लिया था कि अब बहुत हो गया। जब और लोग सिनेमा कर रहे हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकता। मैं कोई पाप नहीं कर रहा था। मैं वहां गया और लोगों ने मुझे काम दिया। जब मैंने फ़िल्म से पैसे कमा लिए तो मैंने भगत सिंह पर नाटक किया। पीयूष मिश्रा ने नए कलाकारों के लिए कहा कि यदि आप आधे मन से काम करेंगे तो आपको परिणाम भी आधे मन से मिलेगा। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि एनके शर्मा के साथ मैं गैलीलियो की रिहर्सल कर रहा था, मुझसे एक्टिंग नहीं हो पा रही थी तो मैं फूट फूट कर रोया। बाद में मैंने गैलीलियो किया। पीयूष मिश्रा ने कहा कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का परिसर उनके लिए मंदिर के समान है और मंडी हाउस रंगकर्मियों का मक्का है। उन्होंने कहा कि यहां जिस लगन से रंगमंच का अभ्यास होता है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रवेश के बाद उन्हें व्यापक अध्ययन का अवसर मिला और उन्होंने विश्व के महान रंग-सिद्धांतकारों एवं गुरुओं जैसे व्सेवोलोद एमिल्येविच मेयरहोल्ड, फ्योदोर दोस्तोएव्स्की और कॉन्स्टैन्टिन स्तानिस्लाव्स्की को पढ़ा। लेकिन मंच पर सबसे अधिक सहायक वह मासूमियत सिद्ध हुई, जिसके साथ उन्होंने रंगमंच में प्रवेश किया था। एनएसडी रंगमंच समूहों को अभ्यास के लिए स्थान उपलब्ध कराएगा भारत रंग महोत्सव के इस सत्र में एनएसडी के निदेशक चित्तरंजन मिश्रा ने कहा कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) मंडी हाउस तथा आसपास के क्षेत्रों के चयनित रंगमंच समूहों को विद्यालय परिसर में रिहर्सल के लिए स्थान उपलब्ध कराकर सहयोग प्रदान करेगा। त्रिपाठी ने मंडी हाउस क्षेत्र में रंगकर्मियों को होने वाली कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए अपने शुरुआती दिनों को याद किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली में रंगमंचीय गतिविधियों को सशक्त बनाने की दिशा में सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है।
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