प्रतिबंध के बजाए बच्चों के उम्र के हिसाब से सोशल मीडिया इस्तेमाल की नीति बनाने की वकालत

Newswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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प्रभात कुमार नई दिल्ली। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया के

प्रतिबंध के बजाए बच्चों के उम्र के हिसाब से सोशल मीडिया इस्तेमाल की नीति बनाने की वकालत

प्रभात कुमार नई दिल्ली।राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल को पूरी तरह से प्रतिबंधित करने के बजाए, निगरानी के लिए नियामक ढांचा/कानून बनाए जाने की वकालत की है। मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि पूरी तरह से प्रतिबंध अक्सर अव्यवहारिक होता है, इसलिए बच्चों के उम्र के हिसाब से सोशल मीडिया के इस्तेमाल के लिए केंद्र सरकार को नियामक कानून /दिशा-निर्देश बनाने का सुझाव दिया है। एनएचआरसी ने कहा है कि 13 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफार्मों का स्वतंत्र इस्तेमाल की इजाजत नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही कानून बनाते समय बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग के लिए ऑस्ट्रेलिया में अपनाए गए तरीकों को ध्यान में रखने को कहा है।राष्ट्रीय

मानवाधिकार आयोग ने हाल ही में ‘बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच पर एक खुली चर्चा आयोजित थी और इसमें संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों से विचार विमर्श के बाद तैयार मसौदे में सरकार के लिए कुल 27 सुझाव दिया है। आयोग ने सुझाव देते हुए कहा है कि ‘बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल को पूरी तरह से प्रतिबंधित करने के बजाए, एक नियामक ढांचा अपनाया जाना चाहिए क्योंकि पूरी तरह प्रतिबंध लगाना अक्सर अव्यवहारिक होता है। आयोग ने सुझाव दिया है कि बच्चों के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल को सुरक्षित, निगरानी में उम्र के हिसाब से अनुमति दी जानी चाहिए। इसमें कहा गया है कि नियामक ढांचा बच्चों के अधिकारों पर आधारित बनाया जाना चहिए, जिसमें बच्चों के जानकारी और बोलने के अधिकार को उनकी सुरक्षा, निजता और सम्मान के अधिकारों के साथ संतुलित किया जाए, जो ग्लोबल चाइल्ड राइट्स स्टैंडर्ड्स और बच्चे के सबसे अच्छे हितों के सिद्धांत के अनुरूप हो।’ इसमें ऑस्ट्रेलिया में अपनाए गए तरीकों की तरह, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नियमों का पालन करने की जिम्मेदारी साफ तौर पर होनी चाहिए, जिससे बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए जवाबदेही पक्की हो सके।13 साल से कम उम्र के बच्चों को स्वतंत्र इस्तेमाल की अनुमति न होमानवाधिकार आयोग ने कहा है कि उम्र के हिसाब से सोशल मीडिया के इस्तेमाल के स्पष्ट नियम बनाए जाने चाहिए, जिसमें 13 साल से कम उम्र के बच्चों को स्वतंत्र रूप से सोशल मीडिया के इस्तेमाल की अनुमति नहीं हो, जबकि 13-15 साल के बच्चे को माता-पिता की सहमति से सोशल मीडिया का इस्तेमाल सीमित और निगरानी में करने की इजाजत दी जानी चाहिए। आयोग ने यह भी सुझाव दिया है कि 15-18 साल के बच्चों को सेफ्टी कंट्रोल और टाइम लिमिट के साथ निगरेगुलेटेड एक्सेस मिले। इसमें कहा गया है कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लक्षित और उचित होनी चाहिए, जिसमें पूरे प्लेटफॉर्म पर बैन लगाने के बजाय अधिक रिस्क वाले फीचर्स (जैसे एनॉनिमस इंटरैक्शन और एडिक्टिव एल्गोरिदम) पर फोकस किया जाना चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बच्चों की पढ़ाई और विकास के मौकों तक पहुंच में कोई बाधा न आए। आयोग ने यह भी सुझाव दिया है कि मजबूत लेकिन निजता का ध्यान रखने वाले एज सत्यापन प्रणाली अनिवार्य रूप से होने चाहिए और दखल देने वाले तरीकों से बचना चाहिए।आयोग ने कहा है कि सोशल मीडिया प्लेटफाार्म को ‘सेफ्टी बाय डिजाइन’ और ‘प्राइवेसी बाय डिफॉल्ट’ के नियम को अपनाने चाहिए, जिसमें नाबालिगों के लिए प्राइवेट अकाउंट, अनजान यूजर्स से मैसेजिंग पर रोक और सीमित खोज शामिल है। नशे की लत वाले डिजाइन फ़ीचर्स जैसे इनफाइनाइट स्क्रॉलिंग, ऑटोप्ले और बहुत अधिक नोटिफिकेशन को रेगुलेट किया जाना चाहिए ताकि नाबालिगों में अधिक इस्तेमाल कम हो सके। साथ ही सोशल मीडिया मंचों के लिए बच्चों की टारगेटेड एडवरटाइजिंग प्रोफाइलिंग और बिहेवियरल ट्रैकिंग पर रोक होनी चाहिए। इसमें ऑस्ट्रेलिया में अपनाए गए तरीकों की तरह, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नियमों का पालन करने की जिम्मेदारी साफ तौर पर होनी चाहिए, जिससे बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए जवाबदेही पक्की हो सके।प्रमुख सुझावआयोग ने कहा है कि एक केंद्रीय नियामक ढांचा बनाया जाए, जिसमें केंद्र सरकार बच्चों की सुरक्षा और प्लेटफॉर्म रेगुलेशन पर एक जैसे स्टैंडर्ड तय करे, जबकि राज्य सरकारें लोकल एनफोर्समेंट, एजुकेशन और बच्चों की सुरक्षा तंत्र के जरिए इसे लागू करने का काम संभालें।- मौजूदा कानूनों को बेहतर जांच, अभियोजन और जवाबदेही के तरीकों से लागू करने को मजबूत किया जाना चाहिए।- एक नियामक प्राधिकरण या मज़बूत निगरानी तंत्र को सभी प्लेटफॉर्म पर नियमों का पालन की निगरानी करना चाहिए और स्टैंडर्ड लागू करने चाहिए।- साइबरक्राइम हेल्पलाइन और रिपोर्टिंग सिस्टम को इंटीग्रेट किया जाना चाहिए और बच्चों के लिए आसान और समय पर शिकायत निवारण सिस्टम के साथ बच्चों के लिए आसान बनाया जाना चाहिए।- नुकसानदायक कंटेंट का पता लगाने और समय पर दखल देने के लिए सही टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके केंद्रीकृत निगरानी प्रणाली विकसित किए जाने चाहिए।- बच्चों से जुड़े ऑनलाइन गलत इस्तेमाल और शोषण के मामलों को सुलझाने के लिए फास्ट-ट्रैक सिस्टम या खास कोर्ट बनाए जाने चाहिए।- डिजिटल लिटरेसी को स्कूल के सिलेबस में शामिल किया जाना चाहिए, जिसमें ऑनलाइन सेफ्टी, प्राइवेसी, साइबर हाइजीन और क्रिटिकल थिंकिंग शामिल हो।- बच्चों, माता-पिता, शिक्षकों और कम्युनिटी के लिए जागरूकता और कैपेसिटी-बिल्डिंग की पहल की जानी चाहिए ताकि सुरक्षित और जिम्मेदार डिजिटल इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा सके।- माता-पिता को संतुलित और बातचीत करने वाला तरीका अपनाने के लिए बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिसमें इस्तेमाल की सही आदतें, सही स्क्रीन-टाइम लिमिट और ऑफलाइन जुड़ाव को बढ़ावा देना।- स्कूलों को डिवाइस के इस्तेमाल के लिए उचित नीतियां लागू करनी चाहिए, काउंसलिंग सहायता प्रदान करनी चाहिए और सीखने के लिए डिजिटल उपकरणों के जिम्मेदार इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहिए।दुनिया का सबसे सख्त प्रावधानऑस्ट्रेलिया ने अभी हाल ही में 10 दिसंबर 2025 से 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर कड़ा प्रतिबंध लागू कर दिया है, जो दुनिया में सबसे सख्त प्रावधान है। आस्ट्रेलिया ने अपने इस कानून के तहत फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को बच्चों के अकाउंट्स को ब्लॉक करने का प्रावधान किया। साथ ही नियमों का पालन नहीं होने पर सोशल मीडिया मंच पर 49.5 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (लगभग ₹400 करोड़) तक के जुर्माने के लिए प्रावधान किया है। इसमें प्रावधान किया है कि नियम का पालन न करने पर बच्चों या अभिभावकों पर नहीं, बल्कि कंपनियों पर जुर्माना लगाया जाएगा। सोशल मीडिया कंपनियों को फेस स्कैन, दस्तावेज या डिजिटल एज स्कैनर तकनीक का उपयोग करके यह सुनिश्चित करना होगा कि 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चे साइन-अप न करें।

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