भारत को नेपाल की नई सरकार से मजबूत रिश्तों की उम्मीद
नेपाल में उदारवादी विचारधारा की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने चुनावों में शानदार जीत हासिल की है, जो 18 साल के कम्युनिस्ट शासन का अंत है। नई सरकार से भारत को रिश्तों को मजबूत करने की उम्मीद है। आरएसपी की विचारधारा आर्थिक उदारवादी है और यह सरकार अपने कार्यकाल में संतुलित विदेश नीति अपनाने की कोशिश करेगी।

नई दिल्ली। नेपाल में उदारवादी विचाराधारा की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) को मिली शानदार जीत को जहां पिछले 18 सालों के कम्युनिस्ट शासन का अंत माना जा रहा है, वहीं भारत को नए दल की सरकार से रिश्तों के मजबूत होने की उम्मीद है। नेपाल में हुए निष्पक्ष चुनावों में जिस प्रकार से आरएसपी पर लोगों, खासकर नई पीढ़ी ने भरोसा जताया है, उससे भारत को उम्मीद है कि नई सरकार का ध्यान देश के आर्थिक विकास पर होगा जिसके लिए वह ताकतवर पड़ोसी देशों से संबंधों में संतुलन बनाकर आगे बढ़ेगी।नेपाल में वर्ष 2008 में लोकतंत्र की स्थापना के बाद से ही कम्युनिस्टों के नेतृत्व में अस्थिर सरकारों का दौर रहा है।
चुनाव से पूर्व हुए जेन जी आंदोलन के बाद नेपाल की जनता ने कुछ साल पूर्व ही अस्तित्व में आई आरएसपी पर भरोसा जताया है तथा उसे स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने का जनादेश दिया है। नेपाल में आठ बार कम्युनिस्ट दलों की सरकारें रही हैं जबकि तीन वामपंथी झुकाव वाली नेपाली कांग्रेस ने कम्युनिस्ट पार्टियों की मदद से सरकार बनाई है।आर्थिक उदारवादी और प्रगतिवादी पार्टीनेपाल के लोकतंत्र के पिछले करीब 18 सालों के इतिहास में 14 प्रधानमंत्री बने हैं। यानी एक पीएम का औसत कार्यकाल 1.2 साल रहा है। अब तक कोई भी पीएम पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। अब तक केपी शर्मा ओली ही लगातार तीन साल तीन महीने सरकार चला पाए हैं। इस दौरान मौजूदा सुशीला कार्की समेत दो स्वतंत्र प्रधानमंत्री भी हुए। बाकी या तो कम्युनिस्ट थे या नेपाली कांग्रेस के। आरएसपी की विचारधारा बिल्कुल अलग है। यह एक आर्थिक उदारवादी और प्रगतिवादी पार्टी के रूप में जानी जाती है। इसके नेता बालेन शाह जो महज 35 साल के हैं, वे जेन जी पीढ़ी के चहेते भी हैं। भारत में पढ़े हैं। माना जा रहा है कि यह सरकार पहली बार पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा करेगी और देश की राजनीति की रीति एवं नीति को बदलेगी।सीधे चीन की गोद में जाकर नहीं बैठने की उम्मीदकूटनीतिक जानकारों की मानें तो आरएसपी पूर्ववर्ती कम्युनिस्ट सरकारों की भांति सीधे चीन की गोद में जाकर नहीं बैठेगी। नई पीढ़ी की यह सरकार चीन समर्थक या भारत समर्थक पारंपरिक लेबल वाली सरकार बनने की बजाय महत्वपूर्ण पड़ोसी मुल्कों के साथ मजबूत द्विपक्षीय ढांचे पर जोर देगी। एक वजह यह भी है कि आरएसपी को मिली अप्रत्याशित सफलता के पीछे अमेरिकी समर्थन भी रहा है। ऐसी कई रिपोर्टें हैं जो बताती हैं कि नेपाल में लोकतंत्र की उन्नति के लिए अमेरिकी एजेंसियों की तरफ से अरबों डॉलर वहां झोंके गए थे, जिसकी परिणति बाद में जेन जी आंदोलन के रूप में भी देखी गई। ऐसी स्थिति में अमेरिकी भी नहीं चाहेगा कि नेपाल की नई सरकार में चीन का दखल बढ़े। यह स्थिति भारत के लिए उपयुक्त है। जनता की उससे बड़ी अपेक्षाएं होंगी, इसलिए भारत जैसे बड़े पड़ोसी देश के साथ उसके लिए संबंधों को मजबूत करने का दबाव होगा। इसके लिए नई सरकार के लिए चीन और भारत के साथ संबंधों में संतुलन बनाकर आगे बढ़ना जरूरी होगा।भारत कूटनीतिक रूप से सतर्कबालेन शाह के नेतृत्व में बनने वाली नई सरकार को लेकर भारत कूटनीतिक रूप से सतर्क भी है। पूर्व में भारत के साथ सीमा विवाद को लेकर शाह की राष्ट्रवादी सोच और सोशल मीडिया पर भारत के खिलाफ भड़काऊ टिप्पणियों को भारत ने नजरंदाज नहीं किया है। काठमांडू का मेयर रहते हुए वर्ष 2023 में उन्होंने अखंड नेपाल का एक नक्शा जारी किया था, जिसमें हिमाचल और उत्तराखंड के कई इलाकों को नेपाल में दिखाया गया था। इसी प्रकार, सोशल मीडिया पर उनकी भारत विरोधी भड़काऊ टिप्पणियों के बाद भारत सर्वोच्च पद पर उनकी ताजपोशी को उपयुक्तता के मापदंड से भी देख सकता है।
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