
परियोजना बेच देने के बाद भी फ्लैटों का कब्जा समय से नहीं मिलने के लिए पुराना बिल्डर भी है जवाबदेह- एनसीडीआरसी
प्रभात कुमार नई दिल्ली। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने कहा है कि अधूरे
प्रभात कुमार नई दिल्ली। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने कहा है कि अधूरे आवासीय परियोजना को किसी अन्य बिल्डर को बेच दिए जाने के बाद भी यदि घर खरीदार को समय से फ्लैट का कब्जा नहीं मिलने पर पुराना बिल्डर भी जवाबदेह होगा। शीर्ष उपभोक्ता आयोग ने अपने इस महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ‘परियोजना को किसी अन्य बिल्डर को बेच दिए जाने से पुराने बिल्डर की जवाबदेही खत्म नहीं हो जाती है।’ एनसीडीआरसी के पीठासीन सदस्य डॉ. इंदर जीत सिंह और सदस्य जस्टिस सुधीर कुमार जैन की पीठ ने अमेरिका में रह रहे प्रवासी भारतीयों की याचिका पर यह महत्वपूर्ण फैसला दिया है।
आयोग ने मौजूदा मामले में खरीदार को समय से घर नहीं मिलने के लिए पुराने बिल्डर को भी सेवा में कमी के लिए दोषी माना है। हाल ही में पारित फैसले में शीर्ष उपभोक्ता अदालत ने कहा कि ‘मामले में चूंकि प्रारंभिक समझौता पुराने बिल्डर (प्रतिवादी संख्या-1 एवं 2 के साथ हुआ था और उनको ही बड़ी राशि का भुगतान किया गया था। साथ ही कहा कि पुराना बिल्डर मूल समझौते के अनुसार निर्धारित समय यानी 31 अक्टूबर 2013 तक शिकायतकर्ताओं को फ्लैट का कब्जा देने में विफल रहे, इसलिए वे (पुराने बिल्डर) भी सेवा में कमी की है और नये बिल्डर (प्रतिवादी संख्या -3 और 4 के साथ संयुक्त रूप से और अलग-अलग उत्तरदायी हैं।’ पीठ ने कहा है कि चूंकि नये बिल्डर ने मार्च 2014 में परियोजना को अधिग्रहित करने के बाद शिकायतकर्ताओं को उनके द्वारा फ्लैटों का कब्जा देने के लिए निर्धारित की जुलाई 2016 तय की थी। लेकिन उस तय समय पर मकान का कब्जा देने में विफल रहे। पीठ ने कहा कि इसलिए, नये बिल्डर भी सेवा में कमी के लिए जिम्मेदार हैं। पीठ ने अपने फैसले में खरीदार को समय से घर नहीं देने के लिए नये और पुराने दोनों बिल्डरों को संयुक्त रूप से या अलग अलग सेवा में कमी के लिए जवाबदेह ठहराया है। हालांकि, आयोग ने कहा है कि मौजूदा मामले में मुख्य दायित्व नये बिल्डर की है। इसके साथ ही, आयोग ने नये बिल्डर को शिकायतकर्ताओं द्वारा भुगतान की गई पूरी मूल राशि 9 फीसदी ब्याज के साथ वापस करने का आदेश दिया है। आयोग ने कहा है कि 45 दिनों के भीतर आदेश का पालन नहीं करने पर 12 फीसदी के हिसाब से ब्याज देना होगा। आयोग ने फैसले में कहा है कि नये बिल्डर की मुख्य देयता तय होने के बावजूद, पुराना बिल्डर यानी प्रतिवादी संख्या -1 और 2 भी तब तक उत्तरदायी रहेंगे जब तक नये बिल्डर द्वारा इस आदेश के अनुसार शिकायतकर्ताओं को रकम का भुगतान नहीं कर देती है। आयोग ने मुकदमा खर्च के तौर पर 50,000 रुपये का भी भुगतान करने का आदेश दिया है। यह है मामला दरअसल, वर्ष 2009 में एम.एस रेड्डी और सायमा एम रेड्डी के साथ-साथ कर्नल जाबा मोनी ने मुंबई में मेसर्स हीरानंदानी पैलेस ग्रीन प्राइवेट लिमिटेड और मेसर्स ग्रीन हैबिटेट्स प्राइवेट लिमिटेड में अपने नाती-पोते को उपहार देने के लिए 5 फ्लैट बुक कराए थे। बिल्डर ने 2013 में इस पर फ्लैटों पर कब्जा देने का भरोसा दिया। बाद में, 2014 में इस परियोजना को मेसर्स इविटा कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड और लूसिफर कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड ई-निलामी में खरीद लिया। इसके बाद मौजूदा खरीदारों को 2016 में घर का कब्जा देने का भरोसा दिया। करोड़ों रुपये के भुगतान के बाद भी 2016 में नये बिल्डर द्वारा कब्जा नहीं दिए जाने के बाद शिकायतकर्ताओं ने 2017 में राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में शिकायत दाखिल कर नये और पुराने बिल्डर से अपने पैसे ब्याज सहित वापस मांगे थे।

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