युद्ध के 72 घंटे बाद कहां खड़े हैं तीनों देश

Mar 02, 2026 05:50 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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दुबई में ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई की मौत के बाद संघर्ष तेज हो गया है। ईरान ने अमेरिका के खिलाफ हमले बढ़ा दिए हैं, जबकि अमेरिका ने अपने सैन्य बेस को बचाने के लिए कार्रवाई की है। इजरायल ईरान समर्थक समूहों से संघर्ष में लगा हुआ है। मध्य पूर्व में शांति और तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ रही है।

युद्ध के 72 घंटे बाद कहां खड़े हैं तीनों देश

दुबई, एजेंसी। मध्य पूर्व में जारी संघर्ष को 72 घंटे से अधिक समय बीत चुका है। पहले ही दिन अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई को खो चुके ईरान ने बदले की कार्रवाई में जवाबी हमले तेज कर दिए हैं। 28 फरवरी की सुबह से शुरू हुई यह जंग अब भी जारी है। इस दौरान ईरान ने अमेरिका के 14 सैनिकों को मार गिराने के साथ इसके सबसे घातक युद्धपोत ‘अब्राहम लिंकन’ पर हमले का दावा किया। वहीं अमेरिका ने बी-2 बमवर्षक विमान जंग में उतार दिए हैं। इजरायल भी लगातार हमले कर रहा है। सैकड़ों लोगों की जान ले चुके वर्चस्व के इस युद्ध में तीन दिन बीत जाने के बाद तीनों देश कहां खड़े हैं, जानते हैं: ईरान : शीर्ष नेता चुनने, जनता का विश्वास जीतने की चुनौती 86 वर्षीय अयातुल्ला खामेनेई 1989 से ईरान के सर्वोच्च नेता थे।

शनिवार सुबह उनकी मौत के बाद ईरान के लिए हमलों का जवाब देने के साथ नया शीर्ष नेता चुनना भी चुनौती बना हुआ है। खामेनेई ने अपना कोई उत्तराधिकारी नहीं चुना था। ऐसे में देश में तीन सदस्यीय लीडरशिप काउंसिल बनाई गई है। विदेश मंत्री अब्बास अराघची का कहना है कि एक-दो दिन में नया नेता चुन लिया जाएगा। इस बीच ईरानी नेताओं के लिए अपनी जनता का विश्वास जीतना भी बड़ी चुनौती है। दरअसल, खामेनेई की मौत के बाद कई जगह जश्न भी मनाया गया। कई ईरानी लोग उन्हें तानाशाह के तौर पर देखते थे। ऐसे में देश के नए नेतृत्व के लिए अमेरिका-इजरायल का जवाब देने के साथ, नए निर्विवादित नेतृत्व के चयन और जनता के साथ आगे बढ़ने की तिहरी चुनौती खड़ी है। अमेरिका : सैन्य बेस बचाने, नए शासन से तालमेल बनाने की चिंता अमेरिका ने बीते कई दशक में मध्य पूर्व के देशों में बड़े पैमाने पर सैन्य मौजूदगी बनाई है। ईरान के कई पड़ोसी देशों में अमेरिका के सैन्य बेस हैं। अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद ईरान लगातार इन देशों पर हमला करने के साथ अमेरिकी बेस को निशाना बना रहा है। ऐसे में अमेरिका के सामने मध्य पूर्व में मजबूत उपस्थिति बनाए रखने के लिए अपने सैन्य बेस बचाए रखना जरूरी हो गया है। इस बीच अमेरिका ने यह भी संकेत दिया है कि वह ईरान के नए नेताओं से बातचीत के लिए तैयार है। दूसरी ओर, कांग्रेस की अनुमति के बिना हमले शुरू करने का अमेरिका में ही विरोध भी हो रहा है। इस स्थिति में अमेरिका के लिए अमेरिकी बेस और सेना पर असर कम से कम होने देने और ईरान के नए नेतृत्व से नई कूटनीतिक पहल करने की चुनौती है। इजरायल : ईरानी समर्थकों से संघर्ष जारी रहने की आशंका इजरायल ईरान को लंबे समय से अपने वजूद के लिए खतरा मानता है। लेकिन क्षेत्र में सिर्फ ईरान ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन नहीं है, यमन के ईरान समर्थक हूती विद्रोही, फलस्तीन में हमास और लेबनान में हिजबुल्ला हमेशा उसे संघर्ष में खींचते रहे हैं। सोमवार को हिजबुल्ला ने इजरायल पर मिसाइलें दागकर अपनी मंशा साफ भी कर दी है। वहीं, हूती विद्रोहियों ने लाल सागर रूट पर हमले करने का ऐलान किया है। हालांकि, इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने देश की सुरक्षा के लिए जीत का दावा किया है। इसके बावजूद क्षेत्रीय इतिहास को देखते हुए यह आशंका जताई जा रही है कि ईरान से जीत जाने के बाद भी उसके समर्थकों से इजरायल का संघर्ष जारी रह सकता है। मध्य पूर्व : क्षेत्रीय शांति, निर्बाध तेल आपूर्ति की चिंता इस बार की लड़ाई पिछले साल हुए इजरायल-ईरान युद्ध से ज्यादा तेज है। इस बार संघर्ष ने पूरे मध्य पूर्व देशों को चपेट में ले लिया है। तीन दिन से खाड़ी देशों में हवाई यातायात ठप है। लाखों लोग हवाई अड्डों पर फंसे हुए हैं। सऊदी अरब, यूएई तक ईरानी मिसाइलें दागी गई हैं। ऐसे में न सिर्फ मध्य पूर्व, बल्कि यूरोप और एशिया के बड़े हिस्से पर इसका असर पड़ने की आशंका है। सबसे बड़ी चिंता दुनिया के बड़े हिस्से में तेल आपूर्ति को लेकर बनी हुई है। होर्मुज स्ट्रेट पर हो रहे हमलों और लाल सागर से जहाजों के गुजरने पर पाबंदी की आशंकाओं के बीच पूरी दुनिया को गहरे आर्थिक संकट में जाने से बचाने के लिए क्षेत्र में जल्द से जल्द शांति होना बहुत जरूरी माना जा रहा है।

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