
वातावरण में प्रदूषण के साथ फैले प्लास्टिक के सूक्ष्म अंश भी सेहत के लिए है बड़ा खतरा
-कोलाकता व दिल्ली की आबोहवा में सांस के जरिये शरीर में पहुंचने योग्य माइक्रो प्लास्टिक की मौजूदगी पाई गई ज्यादा -सर्दी में प्रदूषण के साथ माइक्रो प्लास्टिक का भी बढ़ जाता है स्तर, चार प्रमुख शहरों में...
-कोलाकता व दिल्ली की आबोहवा में सांस के जरिये शरीर में पहुंचने योग्य माइक्रो प्लास्टिक की मौजूदगी पाई गई ज्यादा -सर्दी में प्रदूषण के साथ माइक्रो प्लास्टिक का भी बढ़ जाता है स्तर, चार प्रमुख शहरों में किए शोध में सामने आई यह बात नई दिल्ली, रणविजय सिंह प्रदूषण को लेकर अक्सर पीएम-10, पीएम-2.5, सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड इत्यादि प्रदूषक तत्वों की ही चर्चा अधिक होती है। लेकिन प्रदूषित वातावरण में हवा के साथ माइक्रो प्लास्टिक (प्लास्टिक के सूक्ष्म अंश) भी फैले है जो सेहत के लिए ज्यादा घातक हो सकते हैं। कोलकाता व दिल्ली की आबोहवा में ऐसे माइक्रो प्लास्टिक अधिक है जो सांस के जरिये शरीर में पहुंचकर बीमार बना सकता है।
देश के चार प्रमुख शहरों कोलकाता, दिल्ली, चेन्नई व मुंबई में किए गए एक शोध में यह बात सामने आई है। दिल्ली के डॉक्टर इसे आंखें खोलने वाली अध्ययन बताते हुए कहते हैं कि माइक्रो प्लास्टिक फेफड़े, लिवर, इंडोक्राइन सिस्टम की बीमारियों व कैंसर का कारण बन सकता है। कोलकाता के पृथ्वी विज्ञान विभाग के भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान द्वारा किए गया यह शोध अभी इसी माह एनवायरमेंट इंटरनेशनल में प्रकाशित हुआ है। इस शोध के दौरान सबसे पहले नवंबर 2021 से जुलाई 2022 के बीच थोड़े-थोड़े समय अंतराल पर प्रारंभिक जांच की गई। इसके बाद नवंबर 2022 से मार्च 2023 के बीच चारों प्रमुख शहरों के पांच अधिक घनी आबादी वाले बाजारों से हवा के नमूने लिए गए। ये नमूने सबसे व्यस्त समय में शाम चार बजे से रात आठ बजे के बीच लिए गए। इस दौरान प्रदूषण का स्तर अधिक रहने की संभावना रहती है। अध्ययन में शामिल किए गए सभी बाजारों में दस-दस जगहों से हवा के नमूने लिए गए। इसके बाद उसमें मौजूद माइक्रो प्लास्टिक को अलग कर शोध किया गया। कोलकाता व दिल्ली की आबोहवा में माइक्रो प्लास्टिक का प्रदूषण ज्यादा चेन्नई व मुंबई की तुलना में कोलकाता व दिल्ली की आबोहवा में माइक्रो प्लास्टिक की मौजूदगी अधिक है।इस वजह से इन दोनों शहरों की हवा में प्लास्टिक के ऐसे सूक्ष्म अंश अधिक हैं जो सांस के जरिये शरीर में पहुंच सकते हैं। इस तरह के आइएमपी (सांस के साथ शरीर में पहुंचने योग माइक्रो प्लास्टिक) का कोलकाता में स्तर 14.23 माइक्रोग्राम घन मीटर और दिल्ली में 14.18 माइक्रोग्राम घन मीटर पाया गया। चेन्नई और मुंबई के वातावरण में इसकी मौजूदगी रही बहुत कम। गर्मी की तुलना सर्दी के मौसम में प्रदूषण बढ़ने के साथ हवा में माइक्रो प्लास्टिक का स्तर भी 14 से 71 प्रतिशत बढ़ जाता है। इसका प्रमुख कारण खराब कूड़ा प्रबंधन, सर्दी के मौसम में सिंथेटिक कपड़ों का अधिक इस्तेमाल, वाहनों का अधिक इस्तेमाल और सर्दी में तापमान कम होने से सतह से कम ऊंचाई पर प्रदूषित हवा मौजूद होना है है। इसके अलावा सर्दियों के मौसम में पैकेट बंद खाद्य वस्तुओं का लोग अधिक इस्तेमाल करने लगते हैं। साथ ही गैर निस्तारण योग्य सिंथेटिक सेनेटरी नैपकिन का भी इस्तेमाल अधिक हो रहा है। इस वजह से प्लास्टिक युक्त कूड़ा अधिक उत्पन्न होता है। शाम के वक्त हवा में अधिक होता है माइक्रो प्लास्टिक का अंशशोध में पाया गया कि शाम को बाजारों व सड़कों पर जब भीड़ बढ़ती है तो हवा में माइक्रो प्लास्टिक की सांद्रता बढ़ जाती है। दिल्ली व कोलकाता के हवा के नमूने भी गहरे रंग थे। इसका कारण टायरों के घिसने से उत्पन्न सिंथेटिक काला कार्बन, तंबाकू युक्त अधिक धूम्रपान, कूड़ा व लकड़ी जलाना, जनरेटर सेट का इस्तेमाल हो सकता है। दिल्ली के चांदनी चौक, सरोजनी नगर में अधिक प्रदूषण दिल्ली के चांदनी चौक व सरोजनी नगर मार्केट की हवा में माइक्रो प्लास्टिक का प्रदूषण अधिक पाया गया। वहीं कोलकाता के न्यू मार्केट, सियालदह व बड़ा जार में माइक्रो प्लास्टिक का प्रदूषण ज्यादा है। दिल्ली के इन पांच बाजारों से लिए गए थे नमूने -चांदनी चौक, कनाॅट प्लास, सरोजनी नगर, लाजपत नगर व नेहरू प्लेस कोलकाता -न्यू मार्केट, बड़ा बाजार, हातीबागान मार्केट, सियालदह मार्केट, गरियाहाट मार्केट चारों शहरों के हवा में उत्पन्न माइक्रो प्लास्टिक कोलकाता- 4952 माइक्रो प्लास्टिक प्रति घंटे वर्ग मीटर दिल्ली- 436 माइक्रो प्लास्टिक प्रति घंटे वर्ग मीटर चेन्नई- 2841 माइक्रो प्लास्टिक प्रति घंटे वर्ग मीटर मुंबई- 2750 माइक्रो प्लास्टिक प्रति घंटे वर्ग मीटर वातावरण में सांस लेने योग्य माइक्रो प्लास्टिक की मौजूदगी कोलकाता- 14.23 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर दिल्ली: 14.18 माइक्रोग्राम घन मीटर चेन्नई: 4 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर मुंगई- 2.65 माइक्रोग्राम प्रति घर मीटर ----- कोट--- माइक्रो प्लास्टिक पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) जैसे प्लास्टिक का सूक्ष्म कण होता है। यह खून में पहुंचने पर लिवर, किडनी रोग व तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है। इस पर अभी ज्यादा शोध की जरूरत है। डॉ. जुगल किशोर, निदेशक प्रोफेसर, प्रिवेंटिव मेडिसिन, सफदरजंग अस्पताल माइक्रो प्लास्टिक शरीर में प्रवेश करने से फेफड़े व पेट में सूजन होता है। इससे सांस व लीवर से संबंधित बीमारी होती है। इसके अलावा दीर्घकालिक दुष्प्रभाव कैंसर के रूप में अधिक घातक हो सकता है। डॉ. बॉबी भलोत्रा, श्वास रोग विशेषज्ञ, गंगाराम अस्पताल

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