हमें किसी के वंदे मातरम् गाने या पढ़ने पर कोई आपत्ति नहीं : मदनी

Dec 09, 2025 05:48 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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नई दिल्ली। प्रमुख संवाददाता संसद में वंदे मातरम् पर हुई बहस के संदर्भ

हमें किसी के वंदे मातरम् गाने या पढ़ने पर कोई आपत्ति नहीं : मदनी

नई दिल्ली। प्रमुख संवाददाता संसद में वंदे मातरम् पर हुई बहस के संदर्भ में जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने बयान जारी कर कहा कि हमें किसी के वंदे मातरम् पढ़ने या गाने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन हम यह बात फिर से स्पष्ट करना चाहते हैं कि मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है और अपनी इस इबादत में किसी दूसरे को शरीक नहीं कर सकता। उन्होंने आगे कहा कि वंदे मातरम् की कविता की कुछ पंक्तियां ऐसे धार्मिक विचारों पर आधारित हैं जो इस्लामी आस्था के खिलाफ हैं। विशेष रूप से इसके चार अंतरों में देश को दुर्गा माता जैसे देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है और उसकी पूजा के शब्द प्रयोग किए गए हैं, जो किसी मुसलमान की बुनियादी आस्था के विरुद्ध हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) देता है। इन अधिकारों के अनुसार किसी भी नागरिक को उसके धार्मिक विश्वास के विरुद्ध किसी नारे, गीत या विचार को अपनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। मौलाना मदनी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का भी यह स्पष्ट फैसला है कि किसी भी नागरिक को राष्ट्रगान या ऐसा कोई गीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जो उसके धार्मिक विश्वास के खिलाफ हो। उन्होंने कहा कि वतन से मोहब्बत करना अलग बात है और उसकी पूजा करना अलग बात है। मुसलमानों को इस देश से कितनी मोहब्बत है इसके लिए उन्हें किसी प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं है। आजादी की लड़ाई में मुसलमानों और जमीयत उलमा-ए-हिंद के बुजुर्गों की कुर्बानियां और विशेष रूप से देश के बंटवारे के खिलाफ जमीयत उलमा-ए-हिंद की कोशिशें दिन की रोशनी की तरह स्पष्ट हैं। आजादी के बाद भी देश की एकता और अखंडता के लिए उनकी कोशिशें भुलाई नहीं जा सकतीं। मौलाना मदनी ने वंदे मातरम् के बारे में कहा कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड साफ तौर पर बताता है कि 26 अक्टूबर 1937 को रवींद्रनाथ टैगोर ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखकर सलाह दी थी कि वंदे मातरम् के केवल पहले दो बंदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जाए, क्योंकि बाकी के बंद एकेश्वरवादी धर्मों के विश्वास के विरुद्ध हैं। इसी आधार पर 29 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने यह फैसला किया था कि केवल दो बंदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जाएगा। इसलिए आज टैगोर के नाम का गलत इस्तेमाल करके पूरे गीत को जबरन गवाने की कोशिश करना न सिर्फ ऐतिहासिक तथ्यों को नकारने की कोशिश है, बल्कि देश की एकता की भावना का भी अपमान है।

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