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JNU में कमजोर हो रहा वामपंथी संगठन; VC बोलीं- अब अकेले जीतने लायक नहीं

जवाहर लाल नेहरू विवि की पूर्व छात्रा रह चुकी जेएनयू की वाइस चांसलर शांतिश्री डी पंडित ने कहा कि स्वतंत्र रूप से चुनाव जीतने में असमर्थ वामपंथी संगठन पर गठबंधन करने का दबाव बढ़ रहा है।

JNU में कमजोर हो रहा वामपंथी संगठन; VC बोलीं- अब अकेले जीतने लायक नहीं
Subodh Mishraपीटीआई,दिल्लीSat, 20 Apr 2024 09:12 PM
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जेएनयू में विरोधी राजनीतिक दलों के छात्र संगठनों के बढ़ते प्रभाव के बीच वामपंथी छात्र संगठन कमजोर हो रहा है। स्वतंत्र रूप से चुनाव जीतने में असमर्थ वामपंथी छात्र संगठन पर अन्य संगठनों से गठबंधन करने का दबाव बढ़ रहा है। यह कहना है जेएनयू की वाइस चांसलर शांतिश्री डी पंडित का। जेएनयू की पूर्व छात्रा रह चुकी पंडित का कहना है कि वह स्वतंत्र सोच वाली छात्र संगठनों की ओर से चुनाव लड़ती थीं, जो किसी राजनतिक दल से संबद्ध नहीं हुआ करता था।

प्रेट्र के साथ एक इंटरव्यू में पंडित ने कहा कि हाल में जेएनयू में हुए चुनाव में 1500 वोट नोटा को पड़े, जो दर्शाता है कि छात्रों की रूचि अब न तो वामपंथ में है और न ही दक्षिणपंथ में। जेएनयू से एमफिल और इंटरनेशनल पोलिटिक्स में पीएचडी करने वाली पंडित ने कहा कि आरएसएस से संबद्ध एबीवीपी, कांग्रेस से संबद्ध एनएसयूआई और यहां तक कि आरजेडी से जुड़े छात्र संगठन भी अब जोएनयू में अपनी जड़े जमा रहे हैं जहां कभी वामपंथी छात्र संगठनों का वर्चस्व हुआ करता था। मार्च में हुए चुनाव में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एआईएसए), डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फेडरेशन (डीएसएफ), स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (एआईएसएफ) के यूनाइटेड लेफ्ट पैनल ने बीएपीएसए के साथ संयुक्त रूप से जेएनयूएसयू चुनाव में अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को हराकर जीत दर्ज की। वामपंथी संगठनों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा और एबीवीपी को रोकने के लिए अंतिम समय में बीएसपीएसए का समर्थन किया। यह बताता है कि कैंपस में वामपंथ का वर्चस्व घट रहा है। पहले एसएफआई, एआईएसएफ स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ते थे। उन्हें जीतने के लिए किसी से गठबंधन नहीं करना पड़ता था। लेकिन आज वपमंथी संगठनों को चुनाव जीतने के लिए कई अन्य छात्र संगठनों का सहयोग लेना पड़ रहा है।

पंडित ने कहा कि उनके समय में जेएनयू में करीब 3000 हजार विद्यार्थी हुआ करते थे और आज करीब 10000 विद्यार्थी यहां पढ़ते हैं। इनमें सबसे ज्यादा संख्या बिहार के विद्यार्थियों की है उसके बाद ओडिशा और उत्तर प्रदेश के विद्यर्थियों की। राजस्थान और हरियाणा के छात्रों की संख्या भी बढ़ी है जबकि दक्षिणी राज्यों के छात्रों की संख्या घटी है। यह पूछे जाने पर कि आरएसएस से सहानुभूति रखने के कारण वामपंथ के प्रभाव वाले कैंपस में उन्हें कोई परेशानी तो नहीं होती, पंडित ने कहा, मैं सोचती हूं कि सभी को सहमत या असहमत होने का अधिकार है और यही भारत की सुंदरता है। साथ ही कहा कि उनका जन्म लेनिनग्राद (अब सेंट पीट्सबर्ग) में हुआ, इसलिए उनका डीएनए वामपंथियों से अच्छा है। जब उनसे पूछा गया कि क्या वह वामपंथियों द्वारा संघी वीसी कहलाना पसंद करेंगी, उनका कहना था कि हां, क्योंकि संघ बहुत विस्तृत है और उसका विचार काफी लचीला है। पंडित ने कहा कि उन्होंने कभी भी संघ से अपनी निकटता को नहीं छिपाया। उन्होंने इस बात से साफ इंकार किया कि उनके कार्यकाल में कैंपस के प्रजातांत्रिक संस्कृति में कोई गिरावट आ रही है।