खेल एंकर...खो-खो में पहचानी थी रफ्तार, अब ‘फर्राटा’ ट्रैक पर निपम ने गाड़े झंडे
शामली की निपम चौहान ने अंडर-20 एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर अपना नाम रोशन किया। परिवार और समाज के विरोधों के बावजूद, निपम ने अपने जुनून को बनाए रखा और कठिनाईयों का सामना किया। उनके संघर्ष और सफलता ने गांव की बेटियों के लिए प्रेरणा का काम किया है।

सप्ताह का सितारा अंडर-20 एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप की 100 मीटर दौड़ में चमकी किसान की बेटी, तमाम विरोध और तानों के बीच निपम ने बनाई पहचान
नीरज भार्गव
शामली (यूपी)। कभी स्कूल के खो-खो मैदान में बाकी लड़कियों को छूकर पलक झपकते निकल जाने वाली निपम चौहान को खुद भी अंदाजा नहीं था कि यह रफ्तार एक दिन उसे एशियाई ट्रैक तक पहुंचा देगी। शामली की इस बेटी ने खेल-खेल में अपनी गति पहचानी, फिर उसी को जुनून बनाया। अब हांगकांग में निपम ऐसी दौड़ीं कि 100 मीटर में कांस्य के साथ भारत का 25 साल का इंतजार भी खत्म हो गया।
संघर्ष और सफर
अंडर-20 एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 20 वर्षीय निपम की इस उपलब्धि के पीछे छिपा संघर्ष और ‘खो-खो से ट्रैक तक’ का सफर आज गांव-देहात की बेटियों के लिए मिसाल बन गया है। कैराना तहसील के छोटे से गांव पावटी कलां में किसान शिवकुमार चौहान के घर जन्मी निपम का बचपन बिल्कुल साधारण माहौल में बीता। पिता के पास करीब 20 बीघा जमीन है और मां गीता गृहिणी हैं। परिवार में खेलों का कोई माहौल नहीं था। उल्टा, जब निपम ने खेलों में आगे बढ़ने की जिद शुरू की तो परिवार और समाज के कई लोग ताने देने लगे। कोई कहता-लड़की है, बाहर भेजकर क्या होगा, तो कोई सलाह देता कि घर का काम सीख ले।
मौका देने का भरोसा
इन तानों से बेपरवाह निपम के भीतर कुछ अलग करने की बेचैनी थी। वह पिता से बार-बार कहती, बस मुझे मौका दे दो, मैं नाम रोशन करके दिखाऊंगी। बेटी के इसी भरोसे ने पिता शिवकुमार को उसका सबसे बड़ा सहारा बना दिया। तमाम विरोधों के बावजूद उन्होंने निपम को अभ्यास की पूरी आजादी दी।
निपम को पहली बार अपनी रफ्तार का अहसास स्कूल में खो-खो खेलते समय हुआ था। महज 12 साल की उम्र में वह जब खो-खो में दौड़ती थीं तो बाकी लड़कियां उन्हें पकड़ ही नहीं पाती थीं। वहीं से उनके मन में दौड़ प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का विचार आया। धीरे-धीरे स्कूल की हर दौड़ में वह अव्वल आने लगीं।
प्रशिक्षण और सफलता
प्राथमिक शिक्षा गांव के एक छोटे निजी स्कूल में लेने के बाद निपम ने दसवीं लपराना के होली चाइल्ड स्कूल और इंटर झिंझाना के आरएसएस इंटर कॉलेज से किया। इसी दौरान उन्हें दो साथी खिलाड़ियों से मुजफ्फरनगर के कोच शुभम बालियान के बारे में पता चला। निपम ने पिता को बताया तो उन्होंने बिना देर किए मुजफ्फरनगर में उसके रहने के लिए कमरा किराये पर दिला दिया, ताकि अभ्यास प्रभावित न हो। तब निपम की उम्र 16 साल थी।
कोच शुभम बालियान ने पहली नजर में ही निपम की रफ्तार पहचान ली। गांव के साधारण मैदानों से निकलकर फिर उनका प्रशिक्षण व्यवस्थित तरीके से शुरू हुआ। बाद में कोच की सलाह पर परिवार ने उन्हें पूना और सोनीपत भेजकर राष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग दिलाई। सीमित संसाधनों के बावजूद परिवार ने कभी उनकी तैयारी में कमी नहीं आने दी। मेहनत का असर जल्द दिखने लगा। वर्ष 2024 में कर्नाटक के टुमकुर में आयोजित नेशनल जूनियर अंडर-20 चैंपियनशिप की 100 मीटर दौड़ में निपम ने 11.53 सेकंड का समय निकालकर नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बना दिया। इसी प्रदर्शन के दम पर उनका चयन चीन के हांगकांग में आयोजित एशियाई चैंपियनशिप के लिए हुआ, जहां उन्होंने कांस्य पदक जीतकर अपनी प्रतिभा पर अंतरराष्ट्रीय मुहर लगा दी।
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निपम कहती थी एक दिन सबको जवाब दूंगी : पिता
पिता शिवकुमार कहते हैं कि समाज के ताने कभी-कभी परेशान जरूर करते थे, लेकिन निपम उन्हें अपनी ताकत बना लेती थी। वह कहती थी कि एक दिन मैं सबको जवाब दूंगी। आज वही लोग उसकी तारीफ करते नहीं थकते। हांगकांग से पदक जीतने की खबर आने के बाद गांव पावटी कलां में खुशी का माहौल है। मां गीता बेटी की पसंद की चीजें बनाने की तैयारी में जुटी हैं, जबकि गांव के लोग उसके स्वागत की तैयारी कर रहे हैं। परिवार को अब इंतजार है उस दिन का, जब खो-खो के मैदान से अपनी रफ्तार पहचानने वाली यह बेटी गांव लौटेगी और पूरा गांव उसका स्वागत करेगा।
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