देश में ट्रेनों के सुरक्षित परिचालन की निगरानी सैटेलाइट से होगी
भारतीय रेलवे ने अपनी टक्कर-रोधी तकनीक 'कवच' को सैटेलाइट से जोड़ने की योजना बनाई है। आईएसआरओ के सहयोग से तैयार कवच-वी3.0 का परीक्षण शुरू हो चुका है। यह नई तकनीक दुर्गम इलाकों में ट्रेनों को सुरक्षित रखने में मदद करेगी। इसका आधिकारिक ऐलान इस साल मानसून में होने की संभावना है।

नई दिल्ली, विशेष संवाददाता। भारतीय रेल में ट्रेनों का सुरक्षित परिचालन अब जमीन से नहीं आसमान से होगा। देश की लाइफलाइन कही जाने वाली रेलवे ने अपनी सबसे सुरक्षित टक्कररोधी तकनीक कवच को सैटेलाइट से जोड़ने की तैयारी कर ली है। आईएसआरओ के सहयोग से तैयार कवच-वी3.0 का साइलेंट ट्रायल शुरू हो चुका है, जो एल-बैंड सैटेलाइट के जरिये उन दुर्गम पहाड़ियों-जंगलों में भी ट्रेनों को टकराने से बचाएगा, जहां मोबाइल संपर्क दम तोड़ देती है। रेलवे बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि रेलवे का रेडियो फ्रीक्वेंसी से सैटेलाइट-आधारित सुरक्षा प्रणाली की ओर कदम बढ़ाना न केवल बुनियादी ढांचे में बदलाव है, बल्कि यह दुर्गम भौगोलिक क्षेत्रों में शून्य दुर्घटना के लक्ष्य को पाने के लिए निर्णायक साबित होगा।
उन्होंने बताया कि रेलवे अब कवच-वी3.0 के तहत एल-बैंड सैटेलाइट कनेक्टिविटी का परीक्षण कर रहा है। यह अपग्रेड सीधे अंतरिक्ष (इसरो के उपग्रहों) से जुड़कर ट्रेनों की आवाजाही को सुरक्षित करेगा। उन्होंने बताया कि वर्तमान में कवच रेडियो फ्रीक्वेंसी पर आधारित है, जिसके लिए रेल पटरियों के किनारे प्रत्येक पांच-सात किलोमीटर पर ऊंचे टावर लगाने पड़ते हैं। पहाड़ी इलाकों, गहरी घाटियों और घने जंगलों (जैसे उत्तर-पूर्व भारत और कोंकण रेलवे) में इन टावरों का सिग्नल अक्सर कमजोर पड़ जाता है। सैटेलाइट आधारित यह नया सिस्टम इन गेम-चेंजर साबित होगा।चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा होगा भारतरेलवे बोर्ड के सूत्रों का कहना है कि आईएसआरओ के साथ मिलकर इस तकनीक का ट्रायल अंतिम चरण में है। इसका आधिकारिक ऐलान इस साल मानसून में होने की संभावना है, जिसके बाद इसे सबसे पहले दुर्गम रेल खंडों पर लागू किया जाएगा। कवच का यह सैटेलाइट वर्जन भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा कर देगा जो अंतरिक्ष तकनीक का उपयोग सीधे रेल सुरक्षा के लिए कर रहे हैं।---------------कवच लगाने का कार्य अंतिम चरण मेंसैटेलाइट से जुड़ने के बाद भारी-भरकम जमीनी इंफ्रास्ट्रक्चर यानी टावरों की जरूरत कम होगी। रियल टाइम मॉनिटरिंग से ट्रेन की लोकेशन और स्पीड में एक सेकंड के हजारवें हिस्से की भी देरी नहीं होगी। एल-बैंड की ताकत यह है कि इसकी फ्रीक्वेंसी बारिश, घने कोहरे या खराब मौसम में भी सबसे सटीक काम करती है। साल 2026 के अंत तक 5,000 किलोमीटर के क्रिटिकल रूट को इस तकनीक से जोड़ने का लक्ष्य है। वर्तमान में दिल्ली-हावड़ा व दिल्ली-मुंबई रेलमार्गों (लगभग 3000 किलोमीटर) पर कवच लगाने का कार्य अंतिम चरण में है।
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