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ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला से बात कर बच्चों ने अंतरिक्ष की सैर की

ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला से बात कर बच्चों ने अंतरिक्ष की सैर की

संक्षेप:

विश्व पुस्तक मेले में ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने बच्चों से बातचीत की और अपने अंतरिक्ष यात्रा के अनुभव साझा किए। उन्होंने बच्चों को बताया कि मेहनत और समर्पण से ही कोई अंतरिक्ष यात्री बन सकता है। उन्होंने अपने डर और यात्रा के मजेदार किस्से भी साझा किए, जिससे बच्चों में गर्व और आत्मविश्वास की भावना जागृत हुई।

Jan 13, 2026 07:49 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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नई दिल्ली, प्रमुख संवाददाता। विश्व पुस्तक मेले में अपनी पसंद की पुस्तकों के साथ-साथ पसंदीदा शख्स से भी मिलने का मौका लोगों को मिल रहा है। मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) तक जाने वाले पहले भारतीय ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला बच्चों से मिलने पहुंचे। इस दौरान हर बच्चे के चेहरे पर उत्सुकता थी और हर आंख में अंतरिक्ष को छूने का सपना था। नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक युवराज मलिक द्वारा संचालित इस विशेष सत्र में ग्रुप कैप्टन शुक्ला ने बच्चों से खुलकर बातचीत की। उन्होंने बड़े ही सरल, आत्मीय और मजेदार अंदाज में भारतीय वायु सेना में पायलट बनने से लेकर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक की ऐतिहासिक यात्रा तक की अपनी कहानी सुनाई।

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बच्चों ने अंतरिक्ष, रॉकेट, गुरुत्वाकर्षण और अंतरिक्ष यात्रियों के जीवन से जुड़े कई सवाल पूछे। उन्होंने कहा कि जब मैं अंतरिक्ष गया, तो मैं अकेला नहीं था। मैं एक अरब भारतीयों के सपने और दुआएं साथ लेकर गया था। उनकी यह बात सुनकर बच्चों में गर्व और आत्मविश्वास की झलक साफ दिखी। बच्चों को प्रोत्साहित करते हुए ग्रुप कैप्टन शुक्ला ने कहा कि आज दर्शकों में बैठे बच्चों में से ही कोई कल भारत का अंतरिक्ष यात्री बन सकता है। उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष में केवल 20 दिन बिताने के लिए उन्हें पांच वर्षों तक प्रशिक्षण लेना पड़ा। इससे यह पता चलता है किसी काम को करने के लिए कितनी मेहनत और समर्पण की जरूरत होती है। उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि केवल रोमांचक क्षणों ही नहीं, बल्कि साधारण और रोजमर्रा के कामों का भी आनंद लेना सीखना चाहिए। इस पूरे सफर में उन्होंने अपने डर को भी खुलकर स्वीकार किया और बताया कि जब फाल्कन-9 रॉकेट के इंजन स्टार्ट हुए तो मेरे शरीर की हर हड्डी कांप रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे सारी तैयारी करने के बावजूद प्रश्नपत्र सामने आते ही आप सब कुछ भूल जाएं। उन्होंने फेफड़ों पर दबाव, सांस लेने में कठिनाई जैसी शारीरिक परेशानियों के साथ परिवार से दूर रहने की मानसिक चुनौती के बारे में भी ईमानदारी से बताया। आठ मिनट के रोमांच और आठ मीटर की दूरी के रोमांचक सवाल पर उन्होंने कहा कि यह सिर्फ मेरे लिए ही नहीं, बल्कि मेरे परिवार के लिए भी चुनौतीपूर्ण था। साझा किए अंतरिक्ष के यादगार किस्से वीडियो के साथ कुछ रोचक किस्से सुनाते हुए उन्होंने अंतरिक्ष यात्रा के यादगार पल साझा किए। टूथपेस्ट करने से लेकर, बास्केटबॉल खेलना, पृथ्वी पर लौटने के बाद गुरुत्वाकर्षण भूल जाने के कारण अपना लैपटॉप गिरा देना और लॉन्च पैड की ओर जाते समय फिल्म फाइटर का गीत वंदे मातरम सुनना, ऐसे कई यादगार किस्से थे, जिन्हें सभी सुन रहे थे। आनंद बक्शी के जीवन पर चर्चा थीम पवेलियन में आयोजित एक चर्चा सत्र में महान कवि और गीतकार आनंद बक्शी के जीवन और विरासत का उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर उनके पुत्र राकेश बक्शी के साथ यूनुस खान, डॉ. शालिनी अगम और संगीता बिजित उपस्थित रहीं। वक्ताओं ने आनंद बक्शी की व्यक्तिगत यात्रा को याद करते हुए बताया कि विभाजन के बाद रावलपिंडी से लौटते समय वे अपनी मां की एक तस्वीर उनकी अंतिम स्मृति के रूप में साथ लाए थे। उन्होंने उनकी अनोखी रचनात्मक प्रक्रिया पर भी प्रकाश डाला और बताया कि प्रकृति या पुस्तकों से प्रेरणा लेने के बजाय आनंद बक्शी अक्सर सोफे पर या अपने बैठक कक्ष के किसी शांत कोने में बैठकर, भावनाओं के सहारे गीत रचते थे। सेना के बैंड ने दी प्रस्तुति एम्फीथिएटर में भारतीय सेना बैंड की एक विशेष प्रस्तुति ने बड़ी संख्या में दर्शकों को आकर्षित किया। जब बैंड ने जोशीला देशभक्ति से भरपूर वाद्य संगीत प्रस्तुत किया, तो उनकी अनुशासित और सटीक प्रस्तुति ने गर्व और देशभक्ति की गहरी भावना जगाई। वंदे मातरम भारत की आज़ादी का शंखनाद था: कुमुद शर्मा साहित्य अकादमी द्वारा लेखक मंच पर मंगलवार को ‘वंदे मातरम’ गीत पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्य अकादमी की उपाध्यक्ष कुमुद शर्मा ने की। कुमुद शर्मा ने कहा कि वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आजादी का शंखनाद है। यह स्वाधीनता संग्राम का प्रेरक आधार बना और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक रहा। कुमुद शर्मा ने वंदे मातरम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ब्रिटिश शासनकाल में ‘गॉड सेव द क्वीन’ को अनिवार्य रूप से गवाए जाने के विरोध में बंकिमचंद्र चटर्जी ने इस गीत की रचना की, जिससे भारतीयों में आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की भावना जागृत हुई। आज मेला में खास हाल संख्या 5 सुबह 11 से 11.45 बजे क्रिएटिंग रूल बेस्ड ऑर्डर: रोल ऑफ इंडियन नेवी पर परिचर्चा 12 बजे से 12.45 बजे तक 1947-48 जम्मू और कश्मीर में हुए ऑपरेशन पर परिचर्चा 2 बजे से कैलाश सत्यार्थी का प्रोग्राम 5 बजे से कारगिल 1999 पर परिचर्चा लेखक मंच हॉल संख्या 2 समय 12 से 12.45 बजे तक 21वीं सदी की हिंदी कविता में स्त्री स्वर पर परिचर्चा 1 बजे से 1.45 बजे तक डिजिटल युग में कविता: पाठक, प्लेटफार्म और पहुंच विषय पर परिचर्चा हॉल संख्या 6 में बच्चों से जुड़े कार्यक्रम और विभिन्न गतिविधियां