तैयारी: महंगाई को मापने के मौजूदा पैमाने की विदाई होगी
दिसंबर 2025 में भारत की उपभोक्ता मूल्य सूचकांक शृंखला समाप्त हो गई। यह 2011 से लागू थी और खुदरा महंगाई को मापने का आधार थी। नई शृंखला में वस्तुओं और सेवाओं के नए अधिभार शामिल होंगे, जिससे महंगाई का आंकलन अधिक यथार्थपरक होगा। इसका सीधा असर उपभोक्ता, निवेशक और नीतिगत निर्णयों पर पड़ेगा।

नई दिल्ली। दिसंबर 2025 के साथ भारत की उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की वह शृंखला समाप्त हो गई, जो जनवरी 2011 से लागू थी। यह शृंखला पिछले लगभग 15 वर्षों से भारत में खुदरा महंगाई को मापने का आधार रही है। दरअसल उपभोक्ता मूल्य सूचकांक एक सांख्यिकीय सूचकांक है जो यह बताता है कि आम उपभोक्ता की खरीदारी की टोकरी में शामिल वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में समय के साथ कितना बदलाव हुआ है। इसमें खाद्य पदार्थ, ईंधन, कपड़े, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मदें शामिल होती हैं। समय के साथ लोगों की खपत की आदतें बदल जाती हैं,लेकिन पुरानी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक शृंखला अभी भी 2011 के उपभोग पैटर्न पर आधारित थी।
इस पुराने सूचकांक में डिजिटल सेवा,निजी शिक्षा और स्वास्थ्य,शहरी जीवनशैली से जुड़ी लागत का अधिभार अपेक्षाकृत कम था। हालिया महंगाई आंकड़ों पर सवाल हाल के महीनों में दिख रही कम महंगाई दर और आम लोगों के वास्तविक खर्च के अनुभव के बीच अंतर दिखने लगा था। इससे यह बहस तेज हुई कि क्या मौजूदा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक वास्तविक जीवन की महंगाई को सही ढंग से दर्शा पा रहा है। नई शृंखला से क्या बदलेगा आने वाली नई उपभोक्ता मूल्य सूचकांक शृंखला में संभवतः नया आधार वर्ष, वस्तुओं और सेवाओं के नए अधिभार, शहरी और ग्रामीण खपत में बेहतर संतुलन शामिल होगा, ताकि आंकड़े ज्यादा यथार्थपरक बन सकें। नीति निर्धारण पर असर महंगाई के आंकड़े सीधे तौर पर आरबीआई की ब्याज दर नीति,सरकार की सब्सिडी और कल्याण योजनाओं,वेतन और पेंशन समायोजन को प्रभावित करते हैं। इसलिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में बदलाव केवल सांख्यिकीय नहीं,बल्कि नीतिगत रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है। पुरानी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक शृंखला को विदा कहना कोई असामान्य बात नहीं है। यह एक स्वाभाविक और आवश्यक सांख्यिकीय सुधार है,जो बदलती अर्थव्यवस्था के साथ तालमेल बिठाने के लिए जरूरी है। निवेशक और आम उपभोक्ता पर असर 1. आम उपभोक्ता पर असर (क)महंगाई की परिभाषा बदली हुई महसूस होगी। नई शृंखला में जब वस्तुओं-सेवाओं के अधिभार बदले जाएंगे,तो संभव है कि शिक्षा,स्वास्थ्य,किराया,ट्रांसपोर्ट और डिजिटल सेवाएं महंगाई में ज़्यादा असर डालें। इससे उपभोक्ता को लगेगा कि अब आंकड़े हमारी जेब के ज्यादा करीब हैं। (ख) ब्याज दरों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेंगा। अगर नई सीपीआई में महंगाई ज़्यादा दिखती है तो आरबीआई ब्याज दरें ऊंची रख सकता है,कम दिखती है तो किस्तों में राहत मिल सकती है। होम लोन,कार लोन,पर्सनल लोन की किस्त पर सीधे असर होगा। (ग) वेतन,पेंशन और महंगाई भत्ते पर असर होगा। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का उपयोग महंगाई भत्ता,पेंशन समायोजन में होता है। नया सूचकांक यदि ज़्यादा यथार्थपरक हुआ तो कर्मचारियों को महंगाई भत्ते बढ़ोतरी वास्तविक महंगाई के अनुरूप मिलेगी,पेंशनर्स को भी बेहतर सुरक्षा मिलेगी। 2. निवेशकों पर असर (क) बॉन्ड और फिक्स्ड इनकम निवेश पर असर होगा। महंगाई बढ़ी हुई दिखी तो बॉन्ड यील्ड ऊपर जा सकती है, पुराने बॉन्ड की कीमतों पर दबाव आएगा और डेट फंड निवेशकों को ज्यादा सतर्क रहना होगा। (ख) शेयर बाजार पर प्रभाव पड़ेगा। तेज महंगाई से ब्याज दरें ऊंची होंगी,रियल एस्टेट,ऑटो,कैपिटल गुड्स सेक्टर पर दबाव बढ़ेगा। अगर नियंत्रित महंगाई दिखी तो बैंकिंग, एफएमसीजी,आईटी सेक्टर को सहारा मिलेगा। (ग) गोल्ड और रियल एसेट्स में प्रभाव दिखेगा। अगर नई शृंखला में वास्तविक महंगाई ज़्यादा दिखती है तो सोना एक बेहतर हेज बनेगा और रियल एस्टेट की कीमतों को भी समर्थन मिल सकता है। (घ) रिटर्न की वास्तविक गणना बदलेगी। अब निवेशक सिर्फ मामूली रिटर्न नहीं बल्कि महंगाई समायोजित (वास्तविक रिटर्न) पर ज़्यादा ध्यान देंगे। इससे एसआईपी,इक्विटी बनाम डेट और गोल्ड आवंटन के फैसले बदल सकते हैं।
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