भारत में डाटा सेंटर बनाने में पानी और बिजली की कमी बड़ी चिंता

Dec 16, 2025 01:34 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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भारत में विभिन्न कंपनियों ने डाटा सेंटर बनाने के लिए 70 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है। हालांकि, पानी और बिजली की कमी इस उद्योग के लिए खतरे का कारण बन सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि डाटा सेंटर की बढ़ती मांग से पानी की खपत और बिजली की उपलब्धता पर दबाव बढ़ेगा।

भारत में डाटा सेंटर बनाने में पानी और बिजली की कमी बड़ी चिंता

कई कंपनियों ने भारत में 70 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है, एआई के लिए अच्छा पर इसके खतरे भी शौविक दास नई दिल्ली। भारत में डाटा सेंटर बनाने के लिए 70 अरब डॉलर निवेश की घोषणा अलग-अलग कंपनियों ने की है। 40 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश सीधे तौर पर तीन बड़े डाटा सेंटर बनाने के लिए किए गए हैं। यह भारत की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की महत्वाकांक्षाओं के लिए अच्छा है, लेकिन विशेषज्ञ और रिपोर्ट यह चिंता जताते हैं कि पानी तथा निर्बाध बिजली की कमी इस उद्योग के बड़े खतरे हैं। इससे इन योजनाओं को बड़ा झटका लग सकता है।

पानी की खपत सबसे बड़ी चिंता सबसे बड़ी चिंता पानी की खपत को लेकर है। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2021 में भारत में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता पहले से ही 1700 क्यूबिक मीटर की औसत सीमा से 13% कम थी। अनुमान है कि यह 8 प्रतिशत कम होकर 1367 क्यूबिक मीटर हो जाएगा। यह जरूरी पानी की औसत सीमा से लगभग 20% कम है। आमतौर पर, डाटा सेंटर हजारों प्रोसेसिंग चिप्स का इस्तेमाल करते हैं। बड़े पैमाने पर एआई के उदय ने दुनियाभर में डाटा सेंटर की मांग बढ़ाई है। इसके लिए बड़े पैमाने पर कूलिंग सुविधाओं की भी जरूरत होगी, जिसमें आमतौर पर भारी मात्रा में पानी का इस्तेमाल होता है। डाटा सेंटर के लिए पानी जरूरी क्यों? डाटा सेंटर को ठंडा रखने के लिए दो उपाय होते हैं – वॉटर-बेस्ड कूलिंग और स्पेशलाइज्ड सॉल्यूशंस। डाटा सेंटर प्रोसेसिंग चिप्स को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी का इस्तेमाल करते हैं। पानी आधारित कूलिंग सिस्टम हवा आधारित सिस्टम से ज्यादा कुशल एवं प्रभावी है। यह कम खर्चीली है। कंपनियों का ग्रीन ऊर्जा अपनाने का दावा ज्यादातर बड़ी कंपनियां कह रही हैं कि वे ऐसे डाटा सेंटर बनाएंगी जो क्लीन ऊर्जा से चलेंगे। गूगल ने घोषणा की कि वह 1 गीगावाट का एक बड़ा डाटा सेंटर बना रहा है। यह इसके लिए कई अलग-अलग सप्लायरों से साफ सुथरी बिजली लेगा। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) ने भी ऐसा ही कहा है। इसे अपने डाटा सेंटर प्रोजेक्ट के लिए टीपीजी कंपनी से 1 अरब डॉलर का बड़ा निवेश भी मिला है। हालांकि, यह सब भारत की ग्रीन एनर्जी प्रगति पर निर्भर है पानी और बिजली की उपलब्धता पर दबाव बढ़ेगा विशेषज्ञों का कहना है कि डाटा सेंटर डिजिटल दुनिया के लिए बहुत जरूरी हैं, लेकिन जब इन्हें बहुत बड़े पैमाने पर बनाया जाता है, तो ये दो मुख्य चीजों पर भारी दबाव डालते हैं-पानी और बिजली।इनके दबाव को कम करने के लिए, हमें सोच-समझकर योजना बनानी होगी और सरकार को कुछ नियम बनाने होंगे। डाटा सेंटर कंप्यूटर प्रोसेसिंग के कारण बहुत ज्यादा गर्मी पैदा करते हैं और कुछ प्रदूषणकारी गैसें भी छोड़ते हैं। यह इस बात की चिंता बढ़ाता है कि इतने ज्यादा बिजली खाने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल कैसे किया जाए। एक बड़ी समस्या यह है कि डाटा सेंटर में इस्तेमाल होने वाला पानी अक्सर बर्बाद हो जाता है। इसे अक्सर ठंडा करने के बाद दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। इससे ताजे पानी की खपत बढ़ जाती है। भारत नई नीति भी बना रहा भारत एक ड्राफ्ट डाटा सेंटर पॉलिसी पर काम कर रहा है। इस पॉलिसी में इस क्षेत्र को राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर मानते हुए इसे विनियमित करने के लिए फ्रेमवर्क बनाने की सिफारिश की गई है। इसका एक हिस्सा 2025 का ड्राफ्ट डाटा सेंटर भी शामिल है।जिसके तहत एनर्जी सोलर ग्रिड और छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर से ली जानी चाहिए। कुल मिलाकर, यह पॉलिसी समर्पित डाटा सेंटर इकोनॉमिक जोन बनाने की बात कहती है।

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