
सैटेलाइट की रोशनी से खराब हो रहीं टेलीस्कोप की तस्वीरें
पृथ्वी की निचली कक्षा में सैटेलाइट की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे अंतरिक्ष में 'लाइट पॉल्यूशन' बढ़ रहा है। नासा के अध्ययन के अनुसार, यह प्रदूषण टेलीस्कोप की तस्वीरों को प्रभावित कर रहा है। 2019 में 2000 सैटेलाइट थे, अब 15000 हैं, और आने वाले दशक में यह संख्या 560000 तक पहुंच सकती है।
वॉशिंगटन, एजेंसी। पृथ्वी की निचली कक्षा (लो-अर्थ ऑर्बिट) में सैटेलाइट की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे अंतरिक्ष में ‘लाइट पॉल्यूशन’ भी बढ़ रहा है। नासा के नए अध्ययन में पाया गया है कि यह बढ़ता प्रदूषण अंतरिक्ष में वेधशालाओं और टेलीस्कोप (दूरबीन) के काम को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। अध्ययन के अनुसार, सैटेलाइट से निकलने वाली या प्रतिबिंबित होने वाली रोशनी के कारण ऑर्बिट में मौजूद टेलीस्कोप द्वारा ली गई कई तस्वीरें खराब हो सकती हैं। विशेषज्ञों का मनना है कि नासा के हबल स्पेस टेलीस्कोप की लगभग 40 फीसदी तस्वीरें और अन्य वेधशालाओं की लगभग 96 फीसदी तस्वीरें इस रोशनी से प्रभावित हो सकती हैं।

2019 में लो-अर्थ ऑर्बिट में लगभग 2,000 सैटेलाइट थे, जो अब लगभग 15,000 हो गए हैं। आने वाले दशक में यह संख्या 560,000 तक पहुंच सकती है। दरअसल, जब टेलीस्कोप ब्रह्मांड को देखते हैं, तो सैटेलाइट उनके कैमरे के सामने से गुजरकर चमकीले निशान छोड़ देते हैं, जिससे दूर की गैलेक्सियों और ग्रहों से आने वाले कमजोर सिग्नल धुंधले या मिट जाते हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि इस समस्या से बचने के लिए सैटेलाइट को टेलीस्कोप के ऑपरेटिंग क्षेत्र से नीचे की ऑर्बिट में तैनात किया जाए। यह मुद्दा इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि स्पेस टेलीस्कोप पृथ्वी पर मौजूद टेलीस्कोप की तुलना में अधिक साफ और विस्तृत तस्वीरें लेने में सक्षम हैं। लाइट पॉल्यूशन बढ़ने से वैज्ञानिकों के लिए अंतरिक्ष की गहरी और सटीक जांच करना मुश्किल हो जाएगा। बॉक्स - बेनू के नमूनों में मिली शक्कर और गम नासा के ओसिरिस-रेक्स मिशन के तहत पृथ्वी पर लाए गए एस्टेरॉयड (चट्टानी पिंड) बेन्नू के नमूनों में वैज्ञानिकों को शुगर (चीनी जैसे मॉलिक्यूल) और गम जैसा अजीब पदार्थ मिला है, जिसे उन्होंने ‘स्पेस गम’ नाम दिया है। वैज्ञानिक पिछले कुछ समय से इन नमूनों का अध्ययन कर रहे हैं। ये नई खोजें हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत के बारे में बड़े सवालों के जवाब देने में मदद कर सकती हैं। उनके मुताबिक, ये शुगर मॉलिक्यूल पृथ्वी पर जीवन के लिए जरूरी ‘बिल्डिंग ब्लॉक’ (किसी चीज की आधारशिला या निर्माण का प्राथमिक हिस्सा) हो सकते हैं। वहीं, ‘स्पेस गम’ भी हमारे ग्रह पर शुरुआती जीवन को शुरू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ये नमूने इस बात का सुराग देते हैं कि हमारा सौर मंडल कैसे बना और आखिरकार पृथ्वी पर जीवन कैसे आया।

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