पश्चिमी एशिया संघर्ष ने भारतीय अर्थव्यस्था पर बढ़ा दिया दबाव

Newswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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पश्चिम एशिया में संघर्ष का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ने लगा है। तेल की कीमतें 71 डॉलर से बढ़कर 118 डॉलर प्रति बैरल हो गई हैं। रुपया कमजोर हुआ है और महंगाई बढ़ने की आशंका है। उद्योगों पर भी प्रभाव पड़ा है, खासकर उर्वरक और ऑटो क्षेत्र में। रिपोर्ट में संकट से निपटने के सुझाव दिए गए हैं।

पश्चिमी एशिया संघर्ष ने भारतीय अर्थव्यस्था पर बढ़ा दिया दबाव

नई दिल्ली, विशेष संवाददाता। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ भारत पर भी दिखाई देने लगा है। गुरुवार को भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि युद्ध के चलते तेल और गैस सप्लाई में बाधा, महंगा परिवहन और सप्लाई चेन की दिक्कतों ने भारत जैसी आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है। भारत के लिए प्रभाव और उद्योग व सरकार के लिए आवश्यक कदम विषय पर जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। मौजूदा संघर्ष के कारण जहाजों की आवाजाही करीब 95 फीसदी तक घट गई है।

इससे माल ढुलाई और बीमा खर्च कई गुना बढ़ गया है। युद्ध जोखिम बीमा प्रीमियम 0.25 फीसदी से बढ़कर 5–10 फीसदी हो गया है। कतर, सऊदी अरब और यूएई के बड़े औद्योगिक केंद्रों को नुकसान से गैस और तेल सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित हो सकती है। उदाहरण के तौर पर कतर की एलएनजी क्षमता में 17 फीसदी की गिरावट आई है, जिसे पूरी तरह ठीक होने में पाच साल तक लग सकते हैं।भारत की अर्थव्यवस्था पर असररिपोर्ट में कहा गया है किइस संकट ने भारत की अर्थव्यवस्था पर कई तरह से दबाव डाला है। कच्चे तेल की कीमत 71 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 118 डॉलर तक पहुंच गई। रुपया कमजोर होकर लगभग 93.5 प्रति डॉलर तक चला गया। इसी तरह से विदेशी मुद्रा भंडार घटा और आर्थिक विकास दर का अनुमान घटकर करीब 7.1 फीसदी रह गया। इस बीच महंगाई बढ़ने की आशंका है। क्योंकि तेल की कीमत बढ़ने से हर चीज महंगी होती है। शेयर बाजार भी प्रभावित हुआ है, जिसमें मार्च के दौरान 7 फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज की गई।उद्योगों पर गहरा असरफिक्की का माना है कि भारत के कई उद्योग खाड़ी देशों से आने वाले कच्चे माल पर निर्भर हैं। एलएनजी का 53 फीसदी हिस्सा आयात से आता है, जिसकी कीमत 80 फीसदी तक बढ़ चुकी है। उर्वरक क्षेत्र पर बड़ा असर होगा। क्योंकि भारत 75 फीसदी अमोनिया आयात करता है। इससे उर्वरक सब्सिडी में 20–25 हजार करोड़ रुपये तक बढ़ोतरी की आशंका हैं। प्लास्टिक, पैकेजिंग और एफएमसीजी उत्पादों की लागत 50 फीसदी तक बढ़ी है। ऑटो, टेक्सटाइल, फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र पर असर है। टायर इंडस्ट्री में रबर की कमी है और विनिर्माण क्षेत्र भी प्रभावित हो रहा है।संकट से निपटने के लिए सुझावरिपोर्ट में मौजूदा स्थिति और भविष्य की तैयारियों को लेकर भी सुझाव दिए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि अब बड़े स्तर पर ऊर्जा भंडारण, नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर, खर्च कम करना और जरूरी निवेश बनाए रखने जैसे कदम उठाने की जरूरत है। इसके साथ ही, वैकल्पिक कच्चे माल और ऊर्जा स्रोत ढूंढने होंगे। सप्लाई चेन को मजबूत करना, ऊर्जा बचत और नई तकनीक अपनाने की दिशा में प्रयास तेज करने होंगे। नवीकरणीय ऊर्जा (सोलर, ग्रीन हाइड्रोजन) को बढ़ावा, लॉजिस्टिक्स और आधारभूत मजबूत करना और घरेलू विनिर्माण को गति देना भी आवश्यक है।

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