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आईआईटी गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने प्रदूषण से ईंधन बनाने का तरीका खोजा

आईआईटी गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने प्रदूषण से ईंधन बनाने का तरीका खोजा

संक्षेप:

आईआईटी गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने सूरज की रोशनी से कार्बन डाइऑक्साइड को मेथनॉल में बदलने वाला एक खास कैटेलिस्ट तैयार किया है। यह प्रक्रिया पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाती और इससे ऊर्जा जरूरतें पूरी करने में मदद मिलेगी। तकनीक का इस्तेमाल थर्मल पावर प्लांट्स और फैक्ट्रियों के धुएं को ईंधन में बदलने के लिए किया जा सकता है।

Jan 05, 2026 05:15 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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नई दिल्ली, एजेंसी। आईआईटी गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा खास पदार्थ (कैटेलिस्ट) तैयार किया है जो सूरज की रोशनी का इस्तेमाल करके वातावरण की हानिकारक कार्बन डाइऑक्साइड (सीओटू) को मेथनॉल में बदल सकता है। मेथनॉल एक साफ ईंधन है जिसे गाड़ियों और फैक्ट्रियों में इस्तेमाल किया जा सकता है। ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी इस प्रयास का मकसद पर्यावरण को और नुकसान पहुंचाए बिना बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ मटीरियल्स साइंस में प्रकाशित हुए हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार यह प्रक्रिया पूरी तरह सोलर एनर्जी पर आधारित है, जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता।

दुनियाभर के वैज्ञानिक काम कर रहे थे आईआईटी गुवाहाटी के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग की प्रोफेसर महुआ डे ने कहा कि पेट्रोलियम-आधारित फ्यूल पर निर्भरता कार्बन उत्सर्जन का प्रमुख स्रोत है, जिससे पर्यावरण संकट और ग्लोबल वार्मिंग हो रही है। इसे हल करने के लिए, शोधकर्ता कार्बन डाइऑक्साइड को स्वच्छ फ्यूल में बदलने के लिए फोटोकैटेलिटिक तरीकों को डिजाइन करने पर काम कर रहे हैं। दुनियाभर में वैज्ञानिक 'ग्रेफिटिक कार्बन नाइट्राइड' का इस्तेमाल कर रहे थे, लेकिन वह बहुत जल्दी ऊर्जा खो देता था। आईआईटी की टीम ने इसमें 'ग्राफीन' की परतें मिलाईं, जिससे यह ज्यादा असरदार हो गया। टेस्ट में पाया गया कि जिस मिश्रण में 15% ग्राफीन था, उसने सबसे अच्छी तरह से सीओटू को ईंधन में बदला। फायदा क्या होगा? प्रोफेसर महुआ डे ने कहा कि इस तकनीक का इस्तेमाल थर्मल पावर प्लांट, सीमेंट और स्टील फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं को रोकने और उसे ईंधन में बदलने के लिए किया जा सकता है। इससे ग्लोबल वार्मिंग में कमी आएगी। ईंधन भी सस्ता होगा। पेट्रोल पर निर्भरता कम होगी और कचरे (गैस) से काम की चीज बनेगी। कार्बन को फेंकने के बजाय उसे वापस इस्तेमाल किया जा सकेगा। वैज्ञानिकों का अगला कदम इस तकनीक को लैब से बाहर निकालकर बड़े स्तर पर उद्योगों के लिए तैयार करना है।

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