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Hindi News NCR नई दिल्लीमैं ऐसी फिल्में बनाना चाहता हूं जो अपने बच्चों के साथ देख सकूं : मनीष मूंदड़ा

मैं ऐसी फिल्में बनाना चाहता हूं जो अपने बच्चों के साथ देख सकूं : मनीष मूंदड़ा

इंसाफ के लिए लड़ने वाली ‘सिया दर-दर भटकती है, क्योंकि उसके सामने एक बाहुबली...

इंसाफ के लिए लड़ने वाली ‘सिया दर-दर भटकती है, क्योंकि उसके सामने एक बाहुबली...
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इंसाफ के लिए लड़ने वाली ‘सिया दर-दर भटकती है, क्योंकि उसके सामने एक बाहुबली...
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हिन्दुस्तान टीम,नई दिल्लीTue, 13 Jun 2023 05:20 PM
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इंसाफ के लिए लड़ने वाली ‘सिया दर-दर भटकती है, क्योंकि उसके सामने एक बाहुबली होता है, जो अपनी गलती छिपाने के लिए तमाम हथकंडे अपनाता है। एक गरीब लड़की की यह कहानी बहुत जल्द ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी नजर आएगी। मसान, न्यूटन, आंखों देखी, धनक समेत कई फिल्मों के निर्माता और फिल्म ‘सिया के निर्देशक मनीष मूंदड़ा इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी लेकर आ रहे हैं। अपनी फिल्म, निर्देशन, निर्माण, व्यक्तिगत जीवन और अन्य विषयों के बारे में उन्होंने ‘हिन्दुस्तान के प्रमुख संवाददाता अभिनव उपाध्याय से विस्तार से अनछुए पहलुओं पर बातचीत की। पेश हैं खास अंश...

सवाल : सिनेमाहॉल में प्रदर्शित हो चुकी आपकी पहली निर्देशित फिल्म ‘सिया अब ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आ रही है? इसकी क्या वजह है, क्या आप मानते हैं कि सिनेमाहॉल का अब भविष्य खतरे में है?

जवाब : जहां तक ‘सिया का सवाल है तो हम इसे बनाते समय ही स्पष्ट थे कि इसे देखने के लिए सिनेमाघरों में कम दर्शक आएंगे। जिस परिवेश में हम पले-बढ़े हैं, हमारी दिनचर्या में वैसी तकलीफें होती हैं। उनसे जूझना आम बात है और जब हम सिनेमा देखने जाते हैं तो सोचते हैं कि कुछ मनोरंजन हो जाए, ताकि हम अपनी जिंदगी के दो घंटे भूल जाएं, लेकिन जब हम ऐसी गंभीर फिल्म देखते हैं या जिसमें समाज की वास्तविकता होती है तो हमें यह देखना पसंद नहीं होता है। सत्य देखना हमें पसंद नहीं होता और लोग सिनेमा हॉल में जाने से बचते हैं। मैं पहले भी स्पष्ट था कि लोग इसे देखने के लिए नहीं आएंगे, लेकिन मेरे अंदर ऐसी फिल्में बनाने की एक धुन है। मुझे लगता है कि यह बननी चाहिए, जिन्हें लोग लंबे समय तक याद रखें। आजकल जब हम फिल्म बनाते हैं तो यह कॉम्बिनेशन लेकर चलते हैं कि बॉक्स ऑफिस पर कितना जाएगा और ओटीटी पर कितना जाएगा। इस कॉम्बिनेशन के साथ ही हम व्यावसायिक दृष्टिकोण देखते हैं, जो थिएटर नहीं आना चाहते हैं वह ओटीटी पर उस फिल्म को देख भी लेते हैं। अधिक से अधिक लोगों तक फिल्म पहुंचे हमारा ये मकसद पूरा हो जाता है। इसके अलावा जब हम पूरी फिल्म का कॉमर्शियल ऑस्पेक्ट देखते हैं तो उसमें टीवी, ओटीटी और सिनेमाघर सब हैं। मेरा मानना है कि यदि अच्छा कंटेंट बनाया जाता है तो लोग सिनेमाघरों में देखने के लिए जाएंगे। गंभीर फिल्म होती हैं तो कम लोग जाते हैं और फैंटेसी होती है तो अधिक दर्शक जाते हैं। खासकर, ओटीटी में भी कंटेंट अच्छा हो तो लोग देखना पसंद करते हैं। कोरोना के बाद दोनों (सिनेमाहॉल और ओटीटी) का सर्वाइवल होगा, लेकिन उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी फिल्म बनाने वालों की है। भाषाओं की बाधाएं कम हुई हैं। आज हिंदी के लोग भी तमिल, तेलुगु, मलयालम सहित अन्य भाषाओं की फिल्में देख रहे हैं। फिल्मों की पहुंच गांवों तक बढ़ी है। पहले ऐसा नहीं है। यदि फिल्मों में स्टार वैल्यू नहीं हैं तो लोग देखने नहीं जाते थे, लेकिन ओटीटी के माध्यम से लोग देख रहे हैं।

सवाल : मसान, न्यूटन, आंखों देखी समेत तमाम फिल्में आपने प्रोड्यूस की, क्या वजह थी कि आपने ‘सिया फिल्म का निर्देशन किया?

जवाब : इसकी कहानी वास्तव में बहुत अच्छी है। जब देश में उन्नाव समेत तीन चार घटनाएं दुष्कर्म की हुई थी, तब मेरे मन में यह ख्याल आया। केस स्टडी के बाद मैंने पाया कि समाज आम आदमी और बाहुबली (हैव एंड हैव नॉट्स ) के बीच बंटा है। यदि आपके पास आर्थिक शक्ति है, चाहे आप किसी भी जाति से हों और दूसरा वह आदमी जिसके पास आर्थिक बल नहीं है, उसका शोषण किया जाता है। फिर आपके पास इतना दमखम होता है कि आप पुलिस, कानून, न्याय सबको खरीद लेते हैं और केस को तोड़मरोड़ देते हैं। यह एक कॉमन फैक्टर है कि बाहुबली अपनी ताकत का प्रयोग करते हैं, जिनसे कोई बोल नहीं सकता। हमने इसी आधार पर ‘सिया फिल्म बनाई है कि एक बाहुबली अपनी गलती छिपाने के लिए क्या-क्या करता है। कैसे एक लड़की इंसाफ के लिए लड़ती है, लेकिन हमने फिल्म वहां रोक दी जहां ‘सिया को इंसाफ मिलेगा या नहीं? जब ऐसी घटनाएं घटती हैं तो समाज में हम क्या भूमिका निभाते हैं। महिला सशक्तिकरण जरूरी है और सिस्टम को सशक्त होना चाहिए। ये फिल्म जी5 पर 16 जून को आ रही है।

सवाल : आपने फिल्म प्रोड्यूस भी की है और अब डायरेक्ट कर रहे हैं? दोनों में मुश्किल क्या है?

जवाब : एक प्रोड्यूसर के रूप में आपका काम आसान होता है, क्योंकि आप एक कहानी पढ़ते हो और वह आपको समझ में आ जाती है तो आप चेक साइन कर देते हो, लेकिन यदि आप प्रोड्यूसर और डायरेक्टर दोनों होते हैं और साथ में नौकरी भी करते हैं तो छुट्टी लेकर शूटिंग करनी पड़ती है। मैं अफ्रीका में नौकरी भी करता हूं। निर्देशन करना मुश्किल तो होता है। इस फिल्म की शूटिंग 32 दिन में हुई है।

सवाल : आपकी फिल्में वास्तविकता के करीब हैं और कुछ लोग इसे समानांतर सिनेमा का दर्जा दे रहे हैं। क्या इन फिल्मों को बनाकर आप व्यावसायिक रूप से सफल हैं?

जवाब : हमने ‘आंखों देखी फिल्म के अलावा किसी में पैसा नहीं गंवाया है। यदि आप अच्छी फिल्म बनाते हैं तो हो सकता है कि आप 100 करोड़ न कमाएं, लेकिन जो 6-7 करोड़ रुपये लगाते हैं वह आ जाता है। मेरा मानना है कि मैं फिल्में पैसों के लिए नहीं बनाता हूं। मेरा मकसद है कि जब मैं इस धरती से जाऊं तो मुझे एक तसल्ली रहे कि मैंने जो भी 25 या 40 फिल्में बनाई हैं वह 25 या 50 साल बाद हिंदुस्तान को समझने में सहायक हों। लोग कहें कि यदि 2000 से 2040 तक के हिंदुस्तान को समझना है तो यह 30 या 40 फिल्में देखें। यह मेरा मकसद है। मुझे इसमें मजा आता है।

सवाल : एक नौकरीपेशा व्यक्ति के लिए सिनेमा बनाने का ख्याल कैसे आया?

जवाब : मेरा जन्म झारखंड के देवघर के निकट एक गांव में हुआ है। वहीं पला बढ़ा हूं। हमारे लिए फिल्में ही बाहर का झरोखा थीं। पैसे इतने होते नहीं थे। दो या तीन रुपये का टिकट होता था। जुगाड़ करके देखने जाते थे। पूरी फिल्म एक साथ देख नहीं सकते थे। (हंसते हुए) डेढ़-डेढ़ घंटे करके दो दिन में फिल्में देखते थे, क्योंकि तीन घंटे एक साथ घर से गायब होने पर पकड़े जाने का डर था। डेढ़ घंटा गायब होने पर नहीं पूछा जाता था।

शुरू से ही मन में था कि फिल्म बनानी है। बड़े हुए तो पहले करियर बनाया, पैसा जोड़ा, अपनी जरूरतों को पूरा किया और उसके बाद समय मिला तो फिल्में बनाई। मैं लगभग 80 देशों में घूमा और काम किया।

मैंने देखा कि 1990 के बाद गोविंदा से लेकर करन जौहर के दौर तक हमने सिनेमा में बहुत प्रगति नहीं की है। एक समय था जब हम अर्ध सत्य, मिर्च मसाला या गोविंद निहलानी सहित 70-80 के दशक की फिल्में देखते थे। 90 के दशक में हमने उसे धूमिल कर दिया। तब हमें लगा कि हिंदी सिनेमा को अच्छी फिल्मों की जरूरत थी। अच्छी कहानियों की, जिसमें कहानी मुख्य हीरो न कि किरदार। इसलिए फिल्म बनाना मकसद बनाया कि न व्यापार करना।

सवाल : नौकरी, निर्देशन और स्क्रिप्ट पढ़ने का समय मिल जाता है?

जवाब : (हंसते हुए) मैं 24 घंटे को 48 घंटे बनाकर काम करता हूं।

सवाल : आने वाले वर्षों में दर्शकों के लिए नया क्या ला रहे हैं?

जवाब : मैं अक्टूबर में एक हॉलीवुड फिल्म बनाने जा रहा हूं। इसकी इटली में शूटिंग चल रही है। इसमें कास्ट एंड क्रू सब हॉलीवुड और यूरोप के हैं। मैं हॉलीवुड गया और वहां फिल्म व अकादमी को देखा। हमने वाइल्ड लाइफ पर डॉक्यूमेंट्री शूट किया। पहली डॉक्यूमेंट्री प्रोजेक्ट टाइगर है। इसके अलावा वाइल्ड लाइफ डॉक्यूमेंट्री ‘द रियल जंगल बुक ला रहे हैं। दो हिंदी फिल्में भी शूट करने जा रहे हैं। ये फिल्में भी बिजनेस माइंडेड नहीं है कि इसमें एक आइटम नंबर डाल दूं। थोड़ा मसाला डाल दें कि लोग देखने आएं।

मेरे दो बच्चे हैं और मैं हमेशा ऐसी फिल्में बनाना चाहता हूं कि मैं उनके साथ बैठकर देख सकूं। बेटी अमेरिका में पढ़ रही है तो मैं उसके साथ स्क्रिप्ट भी साझा करता हूं। ऐसी फिल्में बनाता हूं कि मैं साझा कर सकूं।

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