गंगोत्री से गंगासागर तक पहुंची भाजपा की राजनीतिक भागीरथी
रामनारायण श्रीवास्तव नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों ने भाजपा को प्रचंड बहुमत के साथ विजय दिलाई है। यह जीत न केवल राज्य में सत्ता परिवर्तन का प्रतीक है, बल्कि देश की राजनीति को नई दिशा भी दे रही है। भाजपा ने संगठन, संसाधन और जनता के विश्वास के जरिए यह सफलता हासिल की है।

रामनारायण श्रीवास्तव नई दिल्ली। ऐतिहासिक बंगाल विजय के साथ ही भाजपा की राजनीतिक भागीरथी गंगोत्री (उत्तराखंड) से गंगासागर (पश्चिम बंगाल) तक पहुंच गई है। दरअसल, पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों ने न केवल राज्य की सत्ता बदली है, बल्कि देश की राजनीति को भी नई दिशा दी है। भाजपा ने प्रचंड बहुमत के साथ जीत से अपने संस्थापक अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना भी साकार किया है। भाजपा के लिए यह मजबूत नेतृत्व, दृढ़ इच्छाशक्ति, समर्पित संगठन, पर्याप्त संसाधन, अथक मेहनत और जनता द्वारा उसके वादे पर जताए गए भरोसे की जीत है। इस जीत के केंद्र में मोदी-शाह की जोड़ी तो है ही, साथ ही भूपेंद्र यादव ने फिर साबित किया है कि चुनावी रणनीति में उनकी कोई सानी नहीं है।
पश्चिम बंगाल की चुनावी कहानी
वैसे तो यह पांच विधानसभाओं के चुनाव थे, लेकिन देश का सबसे ज्यादा ध्यान पश्चिम बंगाल पर था, जहां भाजपा ने एक दशक में अप्रत्याशित रूप से मजबूत होकर सत्ता के लिए दावा ठोक रखा था। ऐसे में पश्चिम बंगाल की ऐतिहासिक जीत के शोर में भाजपा की असम की बड़ी जीत के साथ सत्ता की हैट्रिक और पुडुचेरी की गठबंधन की सरकार के बरकरार रखने की चर्चा ज्यादा नहीं हो सकी। तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने विजय की आंधी में गठबंधन के भरोसे आगे बढ़ने की राजनीति कामयाब नहीं हो सकी, वहीं केरल में सत्ता परिवर्तन में अपने हिस्से में खाता खुलने से ही संतोष करना पड़ा।
मोदी का संदेश
मोदी ने बिहार के बाद ही दे दिया था संदेश
बंगाल की मौजूदा कहानी 14 नवंबर 2025 की शाम से शुरू होती है, जब प्रधानमंत्री ने बिहार में भाजपा और गठबंधन की ऐतिहासिक जीत के बाद बंगाल के लिए भी भविष्यवाणी कर दी थी। उन्होंने कहा था, गंगा बिहार से बहते हुए बंगाल तक पहुंचती है। बिहार ने बंगाल में भाजपा की विजय का रास्ता भी बना दिया है। इसके बाद भाजपा ने संगठन और संसाधनों से जो काम किया उसके नतीजे सामने हैं।
भाजपा का लक्ष्य
शाह का अंग, बंग और कलिंग का नारा
चुनाव प्रचार के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने भी साफ कर दिया था कि भाजपा का लक्ष्य अंग (बिहार), बंग (बंगाल) व कलिंग (ओडिशा) को जीतने का है। अंग व कलिंग जीत चुके हैं, अब बंग को जीतकर इसे पूरा किया जाएगा। दरअसल, पश्चिम बंगाल की जीत भाजपा की एक दशक की मेहनत की जीत है। भाजपा अध्यक्ष बनने के साथ शाह ने वर्ष 2015 में ही मिशन बंगाल की शुरुआत की थी। 2016 में तासीर समझी और 2021 में तीन से 77 तक बढ़कर अपनी ताकत दिखा दी। इस बार सीधे सत्ता की दावेदारी थी और उसे भी हासिल कर लिया।
भूपेंद्र यादव की भूमिका
भूपेंद्र यादव के सिर एक और जीत का सेहरा
इस बार वैसे तो देशभर के नेताओं को बंगाल में लगाया गया था, लेकिन चुनाव प्रभारी के रूप में भूपेंद्र यादव को लगाया गया। यादव इसके पहले उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और ओडिशा में पार्टी को जिताने में अहम भूमिका निभा चुके थे। उन्होंने बंगाल में भी वही सफलता हासिल कर ली।
महिलाओं का योगदान
महिलाओं का मिला साथ
बंगाल में जीत के पीछे केवल नेतृत्व ही नहीं, बल्कि संगठन, संसाधन, कार्यकर्ताओं की मेहनत के साथ चुनाव के समय जनता से किए गए वादों का भी असर रहा। महिलाओं को तीन हजार रुपये प्रतिमाह का वादा भी महत्वपूर्ण साबित हुआ। महिला आरक्षण के मुद्दे ने भी विपक्ष के खिलाफ कुछ काम तो किया ही, क्योंकि बंगाल की महिलाओं ने बड़ी संख्या में ममता बनर्जी को छोड़कर भाजपा का साथ दिया।
मतदाता समीकरण
एसआईआर से बदली स्थितियां
एसआईआर के बाद राज्य के मतदाताओं के समीकरण बदले, निर्वाचन आयोग की बेहद सख्ती से स्थितियां बदली। मुस्लिम मतदाताओं के मुद्दे ने भी काफी कुछ बदला। इसका भी भाजपा को सीधा फायदा हुआ। इससे भी बढ़कर भाजपा ने सुरक्षा और भय को लेकर भरोसे की राजनीति के लिए जमकर प्रचार किया। आरजी कर मामले ने लोगों को और उद्वेलित किया और पीड़िता की मां को उम्मीदवार भी बनाया।
चुनाव प्रचार की रणनीति
झालमुड़ी भी छाई रही
चुनाव प्रचार में भी प्रधानमंत्री मोदी ने चाय बागान से लेकर सुंदरवन तक लोगों के बीच जाकर जमकर प्रचार किया। रही सही कसर उनके झालमुड़ी ने पूरी कर दी। उन्होंने खुद एक छोटी से दुकान पर जाकर झालमुड़ी खाई और संदेश दिया कि वह आम आदमी के कितने करीब हैं। एक तरह से चुनाव प्रचार झालमुड़ी पर जाकर समाप्त हुआ।


