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निगम कर्मियों को मिलेगा इलाज खर्च का पूरा भुगतान (पेज 1 के लिए प्रस्तावित)

आपात स्थिति में निजी अस्पतालों में इलाज करवाने पर निगमकर्मियों को खर्च का पूरा भुगतान मिलेगा। केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) ने निगम स्कूल की एक शिक्षिका के हक में फैसला देते हुए यह टिप्पणी की है। इससे निगम के हजारों कर्मचारियों और उनके आश्रितों को लाभ होगा। न्यायाधिकरण ने कहा कि निगम कर्मचारियों या आश्रितों को आपात स्थिति में इलाज पर होने वाले खर्च का पूरा भुगतान करने से इनकार नहीं कर सकती।

न्यायाधिकरण के सदस्य के.एन. श्रीवास्तव ने उत्तरी निगम को आदेश दिया है कि वह शिक्षिका के ससुर के इलाज पर हुए खर्च की पूरी रकम का भुगतान करे। न्यायाधिकरण ने कहा है कि तथ्यों को देखने से इसमें कोई दो राय नहीं है कि याचिकाकर्ता के ससुर का पहले इलाज एक निजी अस्पताल में और फिर बाद में सरकार द्वारा संचालित अस्पताल में आपातकालीन सेवा में हुई है। न्यायाधिकरण ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने ससुर को आपात स्थिति में पहले घर के पास निजी अस्पताल में इसलिए ले गए, ताकि उन्हें समय पर इलाज मिल सके। न्यायाधिकरण ने उत्तरी निगम के उन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया कि जिस अस्पताल में मरीज को ले गए वह इलाज करने के लिए अधिकृत नहीं थे। निगम ने कहा था कि उक्त निजी अस्पताल सिर्फ दिल की बीमारी का इलाज करने के लिए अधिकृत है।

दो माह में बाकी रकम का भुगतान करने को कहा

न्यायाधिकरण ने उत्तरी निगम को दो माह के भीतर इलाज पर हुए खर्च के बाकी के रकम का भुगतान करने का आदेश दिया है। निगम ने शिक्षिका के ससुर के इलाज पर खर्च हुए कुल 3,92931 में से महज एक लाख 96050 रुपये का भुगतान किया है। न्यायाधिकरण ने अब निगम से एक लाख 96881 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। हालांकि न्यायाधिकरण ने शिक्षिका की उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें रकम पर 18 फीसदी ब्याज देने की मांग की थी।

क्या था मामला

दरअसल, 27 जनवरी, 2014 को उत्तरी निगम की नरेला जोन में तैनात शिक्षिका के ससुर की तबीयत खराब हो गई। महिला ने उन्हें पास स्थित जयपुर गोल्डन अस्पताल में भर्ती कराया। मरीज की स्थिति गंभीर होता देख डॉक्टरों ने उन्हें 29 जनवरी, 2014 को दिल्ली सरकार के आईएलबीएस हॉस्पिटल में भेज दिया। जहां उन्हें भर्ती कर इलाज शुरू किया गया। लेकिन 2 फरवरी, 2014 को उनकी मौत हो गई। निगम ने इलाज पर खर्च पूरी रकम का भुगतान करने से इनकार कर दिया। इसके खिलाफ महिला ने कैट में याचिका दाखिल की थी।

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