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यहां अंधविश्वास और परंपरा के नाम पर गाय से कुचले जाते हैं लोग

गाय

उज्जैन के पास कुछ गांव में हर साल दिवाली के दूसरे दिन अंधविश्वास बढाने वाली तस्वीरें दिखती हैं। यहां सैकड़ो लोग पेट के बल पर लेट जाते हैं। उनके ऊपर से गायें दौड़ती हुई गुजरती हैं। लोगों में ऐसी मान्यता है कि गाय के कुचले जाने से देवी-देवताओं का आशीर्वाद मिलता है। 

दिवाली के अगले दिन ये आयोजन उज्जैन से 75 किलोमीटर बडनगर तहसील के गांव भिडावद में होता है। गांव में सुबह गाय का पूजन किया जाता है। इस पूजन के बाद लोग जमीन पर उल्टे लेट जाते हैं और उनके ऊपर से गायें दौड़ती हुई निकाली जाती हैं। मान्यता है की ऐसा करने से मन्नतें पूरी होती है। वहीं जिन लोगों की मन्नत पूरी हो जाती है वे भी अगले साल गाय के नीचे लेटते हैं। इस परम्परा के पीछे लोगों का मानना है की गाय में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है। गाय के पैरों के नीचे आने से देवताओं का आशीर्वाद मिल जाता है। जान जोखिम में डालने वाली यह परंपरा गांव में कई सालों से चली आ रही है। गाय से कुचले जाने के बाद ये लोग उठ खड़े होते हैं और ढोल की धुन पर नाचते हैं। 

कई गांवों में परंपरा
गाय से कुचले जाने की परंपरा बडनगर के अलावा लोहरिया और रावदिया गावों में भी चल रही है। इसे गाय और गोहरी कहते हैं। लोग संतान प्राप्ति, अच्छी फसल आदि के लिए मन्नत मानते हैं। लोगों का कहना है कि गायों से कुचले जाने पर उनके शरीर में खरोंच तक नहीं आती। 

उल्लुओं को बलि, बचाने के लिए गश्त 
दिवाली के दौरान कई इलाकों में उल्लुओं को बलि दी जाती है। कई लोग अंधविश्वास और कर्मकांड के लिए और तांत्रिक अनुष्ठान के लिए उल्लूओं को पकड़ कर बलि दे देते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों के अलावा राजस्थान के भरतपुर और आसपास में लोग दिल्ली के दौरान उल्लूओं को पकड़ते हैं। वहीं उल्लूओं की प्रजाति धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है। वहीं दिवाली के दौरान यूपी के बिजनौर के कालागढ़ क्षेत्र में तांत्रिकों से उल्लुओं की जान बचाने के लिए वन विभाग के अधिकारियों ने खास तौर पर टीम तैनात कर रखी थी। इस बार तो उल्लुओं की रक्षा के लिए चार हाथियों से भी गश्त की गई।

उल्लू संरक्षित जीव
भारतीय वन्यजीव अधिनियम, 1972 के अंतर्गत उल्लू एक संरक्षित जीव है। विश्व में उल्लुओं की 200 से ज्यादा प्रजाति होती है, जिनमें से 30 भारत में पाई जाती है।

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  • Web Title:Here people are crushed by cow in the name of superstition and tradition