‘मौत के बाद भी इंसान की इज्जत बनी रहे, यह सरकार की जिम्मेदारी’
हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने सरकारी तंत्र की आलोचना की है, जिसमें कहा गया है कि मृतक की इज्जत मौत के बाद भी खत्म नहीं होती। आयोग ने फरीदाबाद में एक महिला की मौत के बाद शव को ठेले पर ले जाने की घटना पर चिंता जताई। आयोग ने कहा कि यह गरीबों के साथ असमान व्यवहार का उदाहरण है।

चंडीगढ़, एजेंसी। हरियाणा मानवाधिकार आयोग (एचएचआरसी) ने राज्य में सरकारी तंत्र को लेकर तल्ख टिप्पणी की है। आयोग ने कहा है कि इंसान की इज्जत मौत के बाद खत्म नहीं होती। यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इज्जत के साथ अंतिम प्रक्रियाएं पूरी करवाना सुनिश्चित करे। आयोग ने बीते दिनों फरीदाबाद के एक अस्पताल में एक महिला की मौत के बाद परिवार द्वारा शव ठेले पर ले जाने के मामले पर यह बात कही। एचएचआरसी अध्यक्ष जस्टिस ललित बत्रा, सदस्य कुलदीप जैन और दीप भाटिया के पूर्ण पैनल ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लिया था। चार फरवरी को आयोग ने अपने आदेश में कहा कि यह घटना आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए सम्मान, मानवीय व्यवहार और आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित कराने की राज्य की जिम्मेदारी पर गंभीर चिंता पैदा करती है।
पैनल ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार सिर्फ जैविक अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सम्मान के साथ मरने का अधिकार भी शामिल है। पैनल ने कहा, ‘गरीबी की वजह से खराब हालत में किसी परिवार को शव ले जाने के लिए मजबूर करना इज्जत, बराबरी और इंसानियत के हक का उल्लंघन है।’ यह था मामला फरीदाबाद के बादशाह खान सिविल अस्पताल में 28 जनवरी को 35 वर्षीय एक महिला की इलाज के दौरान मौत हो गई थी। अस्पताल से शव सौंपे जाने की प्रक्रिया पूरी करने के बाद परिवार को महिला का शव एक ठेले पर रखकर ले जाना पड़ा था। जानकारी के अनुसार, परिवार को शव ले जाने के लिए वाहन की व्यवस्था के लिए सात सौ रुपये देने को कहा गया था। लेकिन परिवार रकम नहीं जुटा सका। आखिर उन्हें खुले ठेले पर शव घर लेकर जाना पड़ा। इच्छा से नहीं, मजबूरी में किया यह काम आयोग ने घटना पर निराशा जताते हुए कहा कि महिला के शव को ठेले पर अस्पताल से करीब सात किलोमीटर दूर सरूरपुर गांव ले जाया गया। ठेले को महिला के बुजुर्ग ससुर चला रहे थे, जबकि सास और पति उनकी मदद कर रहे थे। वहीं, सात साल का बेटा मां के शरीर को ढकने वाली चद्दर को हवा में उड़ने से बचाने के लिए पकड़े हुए था। कहा कि यह घटना बताती है कि परिवार ने यह काम अपनी इच्छा से नहीं किया, बल्कि सरकारी तंत्र की लापरवाही ने उन्हें इसके लिए मजबूर किया। जनकल्याणकारी शासन का यह मानक नहीं आयोग ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि इस तरह के हालात किसी जनकल्याणकारी शासन के मानकों से मेल नहीं खाते हैं। आयोग ने कहा कि विभिन्न रिपोर्ट से साफ हुआ है कि परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है। महिला के इलाज पर सारी बचत खर्च हो गई थी। यहां तक कि अंतिम संस्कार के लिए भी उन्हें उधार लेना पड़ा। मरने वालों के सम्मान का कोई तरीका नहीं आयोग ने कहा कि महिला का शव ठेले पर ले जाना मृत्यु के बाद भी उसके अपमान की तरह है। यह बताता है कि मरने वाले लोगों (खासकर गरीब तबके के) के साथ सम्मानजनक तरीके से पेश आने के लिए कोई असरदार तरीका नहीं है। कहा, ‘यह घटना मौत के बाद समाज और सरकारी एजेंसियों की इंसान के प्रति परेशान करने वाली बेपरवाही को भी दिखाती है।’ अधिकारियों के बयान असंवेदनशील आयोग ने इस मामले को लेकर अधिकारियों के कथित बयानों को लेकर भी नाराजगी जताई। बताया कि एक अधिकारी ने कहा था कि सरकारी एंबुलेंस शवों को ले जाने के लिए नहीं है। वहीं, एक अन्य का कहना था कि पीड़ित परिवार ने एंबुलेंस के लिए अनुरोध नहीं किया था। आयोग ने कहा कि इस तरह के बयान गंभीर नीतिपरक खामी और प्रशासनिक असंवेदनशीलता दिखाते हैं। कहा कि परिवार ने अनुरोध नहीं किया था, मुद्दा यह नहीं है बल्कि यह है कि क्या राज्य सरकार के पास गरीब परिवारों के मृतकों के लिए शव भिजवाने की सम्मानजनक व्यवस्था है?
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