
अध्ययन : 2041 तक विलुप्त हो सकते हैं दो हजार ग्लेशियर
अगर वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है, तो 2041 तक ग्लेशियरों के पिघलने की दर चरम पर पहुंच सकती है। हर साल लगभग दो हजार ग्लेशियर लुप्त हो सकते हैं। स्विट्ज़रलैंड के वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार, हिमालय और कारकोरम जैसे क्षेत्रों में ग्लेशियरों का सबसे अधिक खतरा है।
- वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर इस खतरे आशंका नई दिल्ली, एजेंसी। अगर वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है, तो दुनिया भर में ग्लेशियरों के पिघलने की दर साल 2041 तक चरम पर पहुंच सकती है। इस दौरान हर साल लगभग दो हजार ग्लेशियर पूरी तरह लुप्त हो सकते हैं। स्विट्ज़रलैंड के ईटीएच ज्यूरिख के वैज्ञानिकों के अध्ययन में यह बात सामने आई है। शोध जर्नल 'नेचर क्लाइमेट चेंज' में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, इसके बाद ग्लेशियरों के खत्म होने की गति कुछ हद तक धीमी पड़ सकती है, क्योंकि उस समय तक छोटे ग्लेशियर पहले ही समाप्त हो चुके होंगे।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि वैश्विक तापमान में चार डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि होती है, तो ग्लेशियरों के पिघलने की दर का चरम वर्ष 2055 के आसपास आएगा। इस स्थिति में हर साल लगभग चार हजार ग्लेशियर समाप्त हो सकते हैं और बड़े ग्लेशियरों के पूरी तरह गायब होने का खतरा भी बढ़ जाएगा। शोधकर्ताओं ने चेताया है कि अब दुनिया का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां ग्लेशियरों की संख्या घट नहीं रही हो। - हिमालय व कारकोरम क्षेत्र पर खतरा अध्ययन में बताया गया है कि कम ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्र और भूमध्य रेखा के निकट स्थित ग्लेशियर सबसे अधिक जोखिम में हैं। इनमें यूरोप के आल्प्स, उत्तरी अमेरिका के रॉकी पर्वत, दक्षिण अमेरिका के एंडीज, अफ्रीका की पर्वत श्रृंखलाएं और एशिया में हिमालय और काराकोरम क्षेत्र शामिल हैं। अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता लैंडर वान ट्रिख्ट ने कहा कि अगले 10 से 20 वर्षों में इन क्षेत्रों के आधे से अधिक ग्लेशियर समाप्त हो सकते हैं।

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