
जलवायु संकट का विकासशील देशों पर सबसे ज्यादा असर
नई दिल्ली में एक शीर्ष प्रतिनिधि ने कहा कि जलवायु संकट गरीबों और हाशिये पर मौजूद लोगों को सबसे अधिक प्रभावित करेगा। COP-30 सम्मेलन में जीवाश्म ईंधनों के चरणबद्ध समाप्ति के लिए ठोस दिशा-निर्देश नहीं दिए गए। रफालोविच ने कहा कि कोयला, तेल और गैस कार्बन डाइऑक्साइड का मुख्य स्रोत बने हुए हैं, जिससे जलवायु संकट और बढ़ रहा है।
नई दिल्ली, एजेंसी। जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए नई अंतरराष्ट्रीय संधि की मांग करने वाले वैश्विक अभियान के एक शीर्ष प्रतिनिधि ने कहा है कि जलवायु संकट गरीब और हाशिये पर मौजूद लोगों को सबसे ज्यादा प्रभावित करेगा। इनमें भारत और अन्य विकासशील देश भी शामिल हैं। जीवाश्म ईंधन अप्रसार संधि के निदेशक एलेक्स रफालोविच ने कहा कि कॉप-30 सम्मेलन में हुए औपचारिक समझौतों के बावजूद जलवायु संकट का सामना करने में हम अभी भी सही राह पर नहीं हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि सबसे अधिक जोखिम उन लोगों पर है जो इस संकट के लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं।
रफालोविच ने कहा ब्राजील में हाल ही आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (कॉप-30) में एक मामूली समझौता हुआ, जिसमें चरम मौसम के प्रकोप से निपटने के लिए देशों को और अधिक धनराशि देने का वादा किया गया। लेकिन इस समझौते में जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने या देशों की वर्तमान उत्सर्जन कटौती प्रतिबद्धताओं को मजबूत करने के लिए ठोस दिशा-निर्देश नहीं दिए गए, जिनकी दर्जनों देशों ने मांग की थी। रफालोविच ने इस बात पर जोर दिया कि कोयला, तेल और गैस कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के मुख्य स्रोत बने हुए हैं, जिससे जलवायु चुनौती जीवाश्म ईंधन संकट के रूप में सामने आ रही है। उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में हमारे वायुमंडल में फंसे कार्बन डाइऑक्साइड का 86 प्रतिशत कोयला, तेल और गैस से आया है। अगर हम इन तीन उत्पादों पर ध्यान नहीं दे सकते, तो हम जलवायु संकट का समाधान नहीं कर सकते। यह मूलतः एक जीवाश्म ईंधन संकट है।

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