संघर्ष लंबा खिंचा तो जीडीपी में सुस्ती संभव : गोपीनाथ
आईएमएफ की पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से वैश्विक अर्थव्यवस्था को गंभीर जोखिम हो सकता है। यदि संघर्ष बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतें 190 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, जिससे भारत सहित कई देशों पर महंगाई और व्यापार घाटा बढ़ेगा।

नई दिल्ली, एजेंसी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष अगर छह माह और लंबा खिंचता है तो इसका असर दुनियाभर की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ेगा। इसका व्यापक असर भारत पर भी देखने को मिलेगा। मंगलवार को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि इस पूरे संकट से दुनिया का ऊर्जा बाजार प्रभावित हुआ है। अगर कच्चे तेल की आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है तो कच्चे तेल की कीमतें अगस्त तक 190 डॉलर प्रति बैरल का स्तर छू सकती हैं।
इससे कई देशों का व्यापार घाटा बढ़ेगा और महंगाई बढ़ेगी। खासकर वे देश जो तेल आयात पर ज्यादा निर्भर हैं, उन्हें ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। भारत भी इनमें शामिल है। आईएमएफ ने 2026 में वैश्विक वृद्धि दर 3.1 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो घटकर 2.5 फीसदी पर आ सकती है।भारत के संदर्भ में गोपीनाथ ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था फिलहाल मजबूत स्थिति में है, लेकिन तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी होने पर इसका असर यहां भी महसूस किया जा सकता है। तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ेगा, जिससे महंगाई और चालू खाते पर दबाव पड़ सकता है। इसके साथ ही आर्थिक वृद्धि की रफ्तार भी कुछ हद तक प्रभावित हो सकती है। आईएमएफ समेत कई रेटिंग एजेसियों ने वित्त वर्ष 2025-2026 और चालू वित्त वर्ष के लिए भारत की वृद्धि दर के 6.5 प्रतिशत पर रहने का अनुमान जताया है। गोपीनाथ ने कहा कि तनाव बरकरार रहा तो जीडीपी वृद्धि में सुस्ती देखने को मिलती है।
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