Delhi News: सुरंगों में फंसे मजदूरों ने जान बचाने के लिए की कड़ी जद्दोजहद
Delhi News: नेपाल में बाढ़ के कारण शिव गिरी और अन्य लोग बचने के लिए ऊपर चढ़ने को मजबूर हो गए। वे 12 घंटे तक जंगल में चले और एक गुफा में रात बिताई। बचाव दल अब भी कई लोगों की खोज कर रहा है। त्रिशूली परियोजना में सिविल इंजीनियर संदीप राणा भी अपने साथियों से बिछड़ गए।

Delhi News: बाढ़ का पानी जैसे-जैसे नीचे की हर चीज को अपने आगोश में लेता जा रहा था, शिव गिरी और छह अन्य लोगों के पास अपनी जान बचाने के लिए ऊपर की ओर चढ़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। मेलुंग जलविद्युत परियोजना से ऊंचाई वाले इलाके की ओर भागते समय उन्होंने अपनी आंखों के सामने घरों, बस्तियों और कई ढांचों को बाढ़ में बहते देखा। जिंदगी बचाने की इस जद्दोजहद में वे लगातार पहाड़ी की ओर बढ़ते रहे। गिरी ने बताया कि उनके कई साथी मजदूर और उनका चचेरा भाई भी बाढ़ के तेज बहाव में बह गए। तिमुरे और धुन्चे कस्बों तक जाने वाले सामान्य रास्ते बंद हो जाने के बाद इस समूह ने करीब 12 घंटे तक जंगल के रास्ते पैदल यात्रा की। इसके बाद उन्हें एक गुफा मिली, जहां उन्होंने रात बिताई।
बचाव कार्य
नेपाल में बाढ़ से प्रभावित पनबिजली परियोजना स्थलों से जान बचाकर भागने की यह एक बेहद मुश्किल घटना थी। यहां बचाव दल अब भी उन सैकड़ों मजदूरों और कर्मचारियों का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं जिनसे 26 अगस्त से कोई संपर्क नहीं हो पाया। माना जा रहा है कि उनमें से कई लोग सुरंगों के अंदर फंसे हुए हैं। अब तक सुरंगों से लगभग 280 लोगों को बचाया जा चुका है। सोमवार को एक स्थल पर नियंत्रित विस्फोट किया गया, जब बचावकर्मी एक बंद सुरंग तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे।
सुरक्षा की ओर यात्रा
मेलुंग पनबिजली परियोजना के तकनीकी कर्मचारी गिरी ने बताया कि अगले दिन यह समूह परियोजना स्थल की ओर नीचे उतरा और बचाव के लिए मदद मांगी। आखिरकार नेपाली सेना के एक हेलीकॉप्टर ने उन्हें काठमांडू पहुंचाया, जहां गिरि का इलाज त्रिभुवन यूनिवर्सिटी टीचिंग अस्तपाल में किया जा रहा है।
निकले थे 100 कर्मचारी, बाद में बचे सिर्फ दो
बचाव के अनुभव
वहीं, अपर त्रिशूली-1 पनबिजली परियोजना में सिविल इंजीनियर संदीप राणा लगभग 100 अन्य कर्मचारियों के साथ पहाड़ी पर चढ़कर बढ़ते बाढ़ के पानी से बच निकले। राणा ने बताया कि जब वह परियोजना कार्यालय में थे, तभी आपातकालीन सायरन बजा। इससे पहले कि कर्मचारी अपने निर्धारित स्थल तक पहुंच पाते, उन्हें बताया गया कि बांध स्थल से लगभग 12 किलोमीटर ऊपर की ओर भारी बाढ़ आ गई। समूह ने ऊंची जगह की ओर चढ़ना शुरू किया और आखिरकार त्रिशूली नदी से लगभग 30 से 35 मीटर ऊपर एक जगह पर पहुंच गया। वहां से उन्होंने परियोजना कार्यालय, शिविर और सड़कों को बाढ़ के पानी में डूबते हुए देखा। यह समूह सात-आठ घंटे तक चढ़ाई करने के बाद गरांग इलाके में एक सड़क तक पहुंचा। जब तक राणा कालिकास्थान पहुंचे, तब तक उनके साथ सिर्फ दो लोग ही बचे थे जबकि बाकी लोग बिछड़ गए थे।
लोहे की सीढ़ी पकड़कर बचाई जान
एक और बचे हुए व्यक्ति की पहचान रामचंद्र के तौर पर हुई। उन्होंने त्रिशूली नदी के किनारे एक सुरंग के अंदर बाढ़ का सामना किया। जब सुरंग के रास्ते में पानी घुसने लगा तो रामचंद्र और उनके पांच साथी सुरंग से बाहर निकलने के रास्ते से सैकड़ों मीटर दूर थे। बह जाने से बचने के लिए उन्होंने सुरंग की छत पर लगी लोहे की सीढ़ी पकड़ ली। रामचंद्र ने बताया कि उन छह लोगों ने खुद को संभालने के लिए टिन की एक चादर का इस्तेमाल किया और करीब छह घंटे तक एक सीढ़ी से दूसरी सीढ़ी तक बढ़ते रहे। उन्होंने कहा कि हम छह लोग थे और बाद में सुरंग के दरवाजे पर हमें एक और व्यक्ति मिला।


