
पराली जलाने के लिए किसान सैटेलाइट को भी चकमा दे रहे
पंजाब और हरियाणा में किसान पराली जलाने के लिए सैटेलाइट्स को चकमा दे रहे हैं। किसान दिन में देर से आग लगाते हैं, जब सैटेलाइट्स उस क्षेत्र से गुजर चुके होते हैं। एक अध्ययन के अनुसार, 2020 के बाद से खेतों में आग लगने की घटनाएं 25-35% कम हुई हैं, लेकिन समस्या अभी भी गंभीर बनी हुई है।
पंजाब हरियाणा में किसानों ने अपनाई नई ट्रिक, दिन में देर से धान की पराली जला रहे इंटरनेशनल फोरम फॉर एनवायरमेंट स्सेटेनेबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी की स्टडी सायंतन बेरा नई दिल्ली। पंजाब और हरियाणा में किसान पराली जलाने के लिए सैटेलाइट को भी चकमा दे रहे हैं। इंटरनेशनल फोरम फॉर एनवायरनमेंट, सस्टेनेबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी(आईफॉरेस्ट) के नए अध्ययन के अनुसार किसान दिन में देर से धान की पराली जला रहे हैं। ऐसा वो तब कर रहे हैं जब निगरानी करने वाले सैटेलाइट उस क्षेत्र से गुजर चुके होते हैं। दोपहर 3 बजे के बाद खेतों में आग लगाई अक्तूबर और नवंबर के महीनों में पराली जलाने का, उत्तर भारत में हवा की गुणवत्ता खराब करने में अहम योगदान होता है।
इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएआरआई) के आंकड़ों में दिखाया गया कि 2021 में अपने चरम पर पहुंचने के बाद से पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनांओं में 90% से अधिक की गिरावट आई है। यह संस्थान आंकड़ों के लिए लगे सेंसर और अन्य उपकरणों से आग की घटनाओं की गिनती करते हैं। आईफॉरेस्ट के अध्ययन में सामने आया कि खेतों में आग अधिकतर दोपहर 3 बजे के बाद लगाई गई। जबकि सैटेलाइट्स सुबह 10:30 बजे से दोपहर 1:30 बजे के बीच गुजरता था। घटनाएं 30 फीसदी तक ही कम हुईं आईफॉरेस्ट की स्टडी में जले हुए क्षेत्र का पता लगाने के लिए जियोस्टेशनरी सैटेलाइट्स के डाटा का इस्तेमाल किया गया। विश्लेषण में पाया गया इस साल पंजाब में लगभग 20000 वर्ग किलोमीटर फसल क्षेत्र को जलाया गया, जबकि हरियाणा में 8800 वर्ग किलोमीटर। इस अध्ययन में 2020 के बाद से खेतों में आग लगने की घटनाओं में 25-35% की कमी दिखाई गई, लेकिन 95% की तेज गिरावट नहीं आई है। वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि नई दिल्ली में वायु-गुणवत्ता प्रबंधन के लिए डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (डीएसएस) को अपनी कार्यप्रणाली में संशोधन करना चाहिए ताकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु-प्रदूषण के हालात में पराली जलाने के योगदान को सटीक रूप से मापा जा सके। पराली की समस्या को नजरअंदाज नहीं कर सकते अनुमान है कि खेतों में आग लगने का सर्दियों में वायु प्रदूषण में 5-10% का योगदान होता है। नया अध्ययन चेतावनी देता है कि पराली जलाने की समस्या को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा, एक्टिव-फायर-काउंट डाटा से यह भी पता चलता है कि किसानों द्वारा धान की खेती करने के कारण फसल जलाने की घटना उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश तक फैल गई है। पराली जलाने के योगदान के बारे में सही जानकारी के बिना, पॉलिसी बनाने वाले गलत दिशा में काम कर सकते हैं। खतरे कम होने के कारण किसान धान अधिक उगा रहे किसान ज्यादा चावल उगा रहे हैं क्योंकि इस फसल से जुड़े खतरे कम हैं। सरकार द्वारा पक्की खरीद के कारण इसे कीमत का समर्थन भी मिलता है। यही वजह है कि 2022-23 और 2025-26 के बीच खरीफ चावल उत्पादन के तहत आने वाला क्षेत्र लगभग 9% बढ़ गया है। किसान अक्सर फसल की कटाई के बाद बची हुई पराली को जला देते हैं क्योंकि उन्हें अगली गेहूं की फसल जल्दी लगानी होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, पराली जलाने को कम करने का एक तरीका यह है कि किसानों को ज्यादा तिलहन और दालें उगाने के लिए मनाया जाए, जिनके लिए भारत आयात पर निर्भर है। प्रदूषण के लिए पराली ही एक मात्र वजह नहीं प्रदूषण के लिए पराली ही एक मात्र वजह नहीं है। कई अन्य वजहें भी हैं। इनमें वाहनों से होने वाला प्रदूषण, कोयला आधारित पावर प्लांट, उद्योग और ईंट के भट्टे, साथ ही खाना पकाने और सर्दियों में गर्मी के लिए ठोस ईंधन (जैसे लकड़ी) का इस्तेमाल शामिल है। आईफॉरेस्ट के अनुसार, एक किलोग्राम पराली से होने वाला प्रदूषण एक टन ऑटोमोबाइल ईंधन जलाने के बराबर है। इस प्रदूषण की तीव्रता बहुत ज्यादा है क्योंकि कोई फिल्टरिंग सिस्टम मौजूद नहीं है। पंजाब में 37, हरियाणा में 25 फीसदी पराली की घटनाएं कम हुईं पंजाब: वर्ष खेतों में आग लगाई गई 2022: 31447 वर्ग किलोमीटर 2025: 20000 वर्ग किलोमीटर हरियाणा: वर्ष खेतों में आग लगाई गई 2019: 11633 वर्ग किलोमीटर 2025: 8812 वर्ग किलोमीटर पंजाब और हरियाणा में एफआईआर वर्ष 2024 6469 2025 2193(66 फीसदी कम)

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