मशहूर शायर बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में निधन
भोपाल में पद्मश्री से सम्मानित उर्दू शायर बशीर बद्र का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे और पिछले 14 वर्षों से डिमेंशिया से ग्रसित थे। उनकी शायरी आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। उनका असली नाम सय्यद मोहम्मद बशीर था।

भोपाल, एजेंसी। ‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए’ जैसे अमर शेर लिखने वाले पद्मश्री से सम्मानित मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र का गुरुवार को भोपाल में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे। परिवार के सूत्रों के अनुसार, बशीर बद्र पिछले 14 वर्षों से डिमेंशिया से पीड़ित थे। बीमारी के कारण उनकी याददाश्त लगातार कमजोर होती चली गई थी, लेकिन उनकी शायरी आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। उन्होंने भोपाल स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली।
शायरी की विरासत
वर्ष 1972 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए शिमला समझौते के दौरान लिखी उनकी पंक्तियां- ‘दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।’ आज भी लोगों की जुबां पर हैं।
जन्म और शिक्षा
15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में जन्मे बशीर बद्र का असली नाम सय्यद मोहम्मद बशीर था। भाषा पर उनकी गहरी पकड़ और खासतौर पर गजलों में उनकी महारत ने उन्हें उर्दू शायरी की दुनिया में विशिष्ट पहचान दिलाई। वह फारसी, हिंदी और अंग्रेजी के भी विद्वान थे।
परिवार और लोकप्रियता
बशीर बद्र अपने पीछे पत्नी और दो बच्चों का परिवार छोड़ गए हैं। उनकी लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं थी। अमेरिका, दुबई, कतर और पाकिस्तान समेत दुनिया के कई देशों में उनके चाहने वाले मौजूद थे और उन्हें मुशायरों व साहित्यिक आयोजनों में विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता था।


