भारतीय संसदीय इतिहास में पास न हो पाने वाले प्रमुख विधेयक
भारत में कई विधेयक जैसे कृषि कानून, भूमि अधिग्रहण संशोधन, और महिला आरक्षण विधेयक जन-विरोध या राजनीतिक असहमति के कारण पास नहीं हो सके। किसान आंदोलन ने कृषि कानूनों को निरस्त करने पर मजबूर किया, जबकि अन्य विधेयक भी विभिन्न कारणों से लंबित रहे।

- तीन कृषि कानून (2020-2021) : ये कानून संसद द्वारा पारित कर दिए गए थे और राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई थी, लेकिन भारतीय संसदीय इतिहास में यह पहली बार हुआ कि व्यापक जन-विरोध (किसान आंदोलन) के कारण सरकार को पारित कानूनों को निरस्त करना पड़ा। - भूमि अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक, 2009: यूपीए-1 सरकार द्वारा 2007 के संशोधन विधेयक को आगे बढ़ाते हुए इसे पेश किया गया था। लेकिन 14वीं लोकसभा के भंग होने के साथ ही यह विधेयक भी समाप्त हो गया।- भूमि अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक, 2015: मोदी सरकार ने यूपीए (यूपीए) के 2013 के कानून में संशोधन करने के लिए यह विधेयक लाया था।
इसका उद्देश्य निजी परियोजनाओं के लिए सामाजिक प्रभाव आकलन (एसआईए) और सहमति क्लॉज को हटाना था। यह विधेयक लोकसभा में तो पास हो गया, लेकिन राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण पास नहीं हो सका।- विदेशी शैक्षणिक संस्थान विधेयक : यह विधेयक लंबे समय से लंबित रहा, जो विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर स्थापित करने और डिग्री प्रदान करने की अनुमति देता था। यूपीए और बाद की सरकारों के कार्यकाल में भी वामपंथी और कुछ अन्य दलों के विरोध के कारण यह पास नहीं हो सका।- महिला आरक्षण विधेयक (कई बार): पूर्व में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय से लेकर कई बार पेश किया गया लेकिन सर्वसम्मति की कमी से नहीं पास हो सका।- बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक, 2021 : लड़कियों की शादी की उम्र 18 से बढ़ाकर 21 करने का प्रस्ताव, जो अभी भी चर्चा और विरोध के कारण अटका है।- 64वां संविधान संशोधन विधेयक (1989): पंचायती राज को मजबूत करने का यह प्रस्ताव भी राज्यसभा में अटक गया था।
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