
कार्बन रियायतें दूसरों के साथ भारत पर भी लागू होंगी
यूरोपीय संघ ने भारत के साथ प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते में कड़े कार्बन नियमों पर कोई सीधी रियायत नहीं दी है। हालांकि, यदि भविष्य में किसी अन्य देश को छूट मिलती है, तो भारत को भी वही सुविधा मिलेगी। कार्बन सीमा समायोजन प्रणाली 1 जनवरी से लागू हो चुकी है और यह भारत-ईयू व्यापार वार्ताओं में एक विवादास्पद मुद्दा रहा है।
नई दिल्ली, एजेंसी। यूरोपीय संघ (ईयू) ने भारत के साथ प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) में अपने कड़े कार्बन नियमों पर भारत को कोई सीधी रियायत नहीं दी है। हालांकि, ईयू इस अहम बिंदु पर सहमत हुआ है कि कार्बन सीमा समायोजन प्रणाली (सीबीएएम) के तहत यदि भविष्य में किसी अन्य देश को कोई भी छूट या राहत दी जाती है, तो वही सुविधा स्वतः भारतीय निर्यातकों को भी उपलब्ध होगी। एक सरकारी अधिकारी ने मंगलवार को यह जानकारी दी। कार्बन सीमा समायोजन प्रणाली व्यवस्था के तहत ईयू इस्पात, एल्युमीनियम, उर्वरक और सीमेंट जैसी वस्तुओं पर कार्बन कर लगाएगा, क्योंकि इनके निर्माण के दौरान एक निर्धारित सीमा से अधिक कार्बन उत्सर्जन होता है।
वर्तमान में, यह कर इस्पात और एल्युमीनियम उत्पादों पर लागू है। समझौते में अधिकारों को फिर से संतुलित करने का प्रावधान भी शामिल किया गया है। यह व्यवस्था उस स्थिति में लागू होगी, जब सीबीएएम के तहत ईयू के कदम भारत को एफटीए के तहत मिलने वाले व्यापारिक लाभों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कार्बन टैक्स जैसे उपायों के कारण भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति कमजोर न हो। वाणिज्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, “सीबीएएम एक बेहद कठिन मुद्दा है और इसमें किसी भी देश के लिए फिलहाल कोई सीधी छूट नहीं है। हालांकि, यह एक महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता है कि भविष्य में यदि ईयू किसी अन्य देश को इस नियम के तहत कोई रियायत देता है, तो वही रियायत भारत को भी अपने आप मिल जाएगी। हमने इस बिंदु पर ईयू को राजी किया है।” एक जनवरी से लागू हो चुकी है कार्बन टैक्स व्यवस्था कार्बन सीमा समायोजन प्रणाली, जिसे आमतौर पर कार्बन टैक्स कहा जाता है, एक जनवरी से प्रभावी हो चुकी है। यह भारत-ईयू व्यापार वार्ताओं के दौरान सबसे विवादास्पद मुद्दों में से एक रहा है। इस व्यवस्था के तहत ईयू उन उत्पादों पर कार्बन कर लगाएगा, जिनके उत्पादन के दौरान तय मानकों से अधिक कार्बन उत्सर्जन होता है। इसके अलावा, दोनों पक्ष कार्बन कीमत निर्धारण, सत्यापनकर्ताओं की मान्यता, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी और उभरती कार्बन आवश्यकताओं के अनुपालन के लिए तकनीकी सहयोग बढ़ाने पर भी सहमत हुए हैं। साथ ही, इस दिशा में वित्तीय सहायता और लक्षित समर्थन उपलब्ध कराने पर भी सहमति बनी है।

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