गर्भपात में पति की अनुमति जरूरी नहीं : हाईकोर्ट

Jan 08, 2026 08:07 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने गर्भपात के मामले में महिला को बरी करते हुए कहा कि किसी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने महिला के प्रजनन अधिकार और मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। पति की अनुमति लेना आवश्यक नहीं है।

गर्भपात में पति की अनुमति जरूरी नहीं : हाईकोर्ट

नई दिल्ली, प्रमुख संवाददाता। दिल्ली उच्च न्यायालय ने चौदह सप्ताह के गर्भ को गिराने के मामले में महिला को बरी करते हुए स्पष्ट किया कि किसी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था जारी करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने कहा कि ऐसा करना महिला के शरीर पर उसके अधिकार का उल्लंघन है और मानसिक आघात बढ़ाने वाला कदम है। महिला अपने पति से अलग रह रही थी। अदालत ने वैवाहिक कलह की स्थिति में महिला के गर्भपात कराने के स्वायत्त अधिकार को सही ठहराया और कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 312 का इस पर कोई लागू नहीं होता।

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि चिकित्सा गर्भपात अधिनियम के तहत गर्भपात के लिए पति की अनुमति लेना जरूरी नहीं है। इसका उद्देश्य महिला के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करना है। याचिकाकर्ता महिला ने सत्र अदालत के आदेश को चुनौती दी था जिसमें उसे धारा 312 के तहत मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष पेश होने के लिए तलब किया गया था। उसने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता और निजता के अधिकार का हवाला दिया। अदालत ने पति के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि वैवाहिक कलह को केवल साथ रहने या मुकदमेबाजी तक सीमित नहीं किया जा सकता। महिला पहले से ही शादी के दबाव में थी और उसने पति से अलग होने का निर्णय लिया था। अदालत का यह फैसला महिलाओं के प्रजनन अधिकार और शरीर पर स्वायत्तता के महत्व को स्पष्ट करता है और मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है।

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