
तीस वर्ष पुराने रिश्वत मामले में एएसआई को राहत नहीं
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 1995 के भ्रष्टाचार मामले में निचली अदालत की दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा है। आरोपी ने शिकायतकर्ता से 10,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी, जिसे बाद में 5,000 रुपये तय किया गया। हाईकोर्ट ने कहा कि मजबूत सबूतों के आधार पर सजा दी जा सकती है, भले ही मामले में देरी हो।
नई दिल्ली, कार्यालय संवाददाता। दिल्ली उच्च न्यायालय ने वर्ष 1995 के एक भ्रष्टाचार मामले में निचली अदालत द्वारा दी गई दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखते हुए आरोपी की आपराधिक अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने माना कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज इस मामले में दोषसिद्धि के निष्कर्षों में कोई कानूनी खामी नहीं है और अभियोजन पक्ष ने रिश्वत की मांग व स्वीकार किए जाने के आरोप को ठोस साक्ष्यों से सिद्ध किया है। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। मामले के अनुसार, वर्ष 1995 में शिकायत दर्ज कराई गई थी कि शकरपुर बस्ती पुलिस पोस्ट में सहायक उप-निरीक्षक (एएसआई) के पद पर तैनात आरोपी ने शिकायतकर्ता को उसके भाई द्वारा की गई शिकायतों के सिलसिले में परेशान न करने के बदले दस हजार रुपये की अवैध रिश्वत की मांग की थी।
बाद में यह रकम घटाकर पांच हजार रुपये तय की गई, जिसके बाद सीबीआई ने जाल बिछाया और आरोपी को रंगे हाथों रिश्वत की रकम के साथ पकड़ लिया। हाईकोर्ट ने आरोपी की ओर से दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली दलीलों को खारिज कर दिया। इस मामले में कोर्ट ने मुकदमा दर्ज होने के बाद फैसला आने में लगभग 30 साल लग जाने वाले तर्क पर कहा कि मामले में देरी हो जाने से मुकदमे पर शक नहीं किया जा सकता है। यदि सबूत मजबूत हैं तो सालों बाद भी सजा दी जा सकती है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला सही माना और आरोपी की सजा को बरकरार रखा। इसमें ढाई साल की सख्त जेल की सजा भी शामिल है।

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