
संपादित---दुष्कर्म मामले में तीन आरोपियों को बरी करने का फैसला बरकरार
दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि अगर आरोपों के समर्थन में मजबूत संदेह नहीं है, तो आपराधिक ट्रायल जारी नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने तीन आरोपियों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। शिकायतकर्ता ने शुरुआत में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया, लेकिन बाद में सहमति से संबंध बताया और किसी अपराध से इनकार किया।
नई दिल्ली, कार्यालय संवाददाता। दिल्ली उच्च न्यायालय ने साफ कहा है कि यदि किसी मामले में आरोपों के समर्थन में मजबूत संदेह नहीं बनता, तो आपराधिक ट्रायल जारी नहीं रखा जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने दुष्कर्म मामले में तीन आरोपियों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने फैसले में कहा कि सत्र अदालत द्वारा आईपीसी की धारा 328 और 376 के आरोपों से आरोपियों को मुक्त करना सही था। कोर्ट ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बताया कि शिकायतकर्ता ने शुरुआत में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था, लेकिन बाद में मजिस्ट्रेट के समक्ष सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दिए गए स्वैच्छिक बयान में उसने संबंध को सहमति से बताया और किसी अपराध से इनकार किया।
राज्य की ओर से दलील दी गई कि शुरुआती शिकायत और मेडिकल जांच के आधार पर ट्रायल होना चाहिए था तथा बयानों में विरोधाभास ट्रायल के दौरान परखे जाने चाहिए थे। वहीं, बचाव पक्ष ने कहा कि शिकायतकर्ता ने मजिस्ट्रेट के सामने स्वेच्छा से आरोप वापस लिए और बाद में भी उसी बात को दोहराया, जिससे अभियोजन का मामला शुरू में ही कमजोर हो गया।

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