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संपादित---स्वतंत्रता को छीनने के लिए निर्वासन आदेश का इस्तेमाल गलत: हाईकोर्ट

संपादित---स्वतंत्रता को छीनने के लिए निर्वासन आदेश का इस्तेमाल गलत: हाईकोर्ट

संक्षेप: दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि निर्वासन आदेश का उपयोग लोगों की स्वतंत्रता और आजीविका के अधिकार से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि ऐसे आदेश यांत्रिक तरीके...

Tue, 21 Oct 2025 08:10 PMNewswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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नई दिल्ली, प्रमुख संवाददाता। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी व्यक्ति की आवाजाही को प्रतिबंधित करने वाले निर्वासन आदेश का इस्तेमाल पूरी तरह से निराधार आधार पर लोगों को उनकी स्वतंत्रता व आजीविका के अधिकार से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने कहा कि निर्वासन आदेश किसी व्यक्ति की आवाजाही को सीमित व प्रतिबंधित करने वाला एक असाधारण उपाय है। ऐसे आदेश यांत्रिक तरीके से नहीं बनाए जाने चाहिए। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि हालांकि इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि समाज में कानून-व्यवस्था और शांति बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण दायित्व पुलिस पर है।

लेकिन साथ ही इसका इस्तेमाल पूरी तरह से बगैर आधार पर लोगों को उनकी स्वतंत्रता व आजीविका के अधिकार से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता। पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए आगे कहा कि निर्वासन आदेश किसी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध का न्यायिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह अपराध के बढ़ने के संदर्भ में कानून-व्यवस्था के दायरे में आता है। अपराध को बढ़ने से रोकने के लिए किसी व्यक्ति पर ऐसे प्रतिबंध लगाए जाते हैं जो सामान्य समय में अनुचित लग सकते हैं। पीठ ने कहा कि इस तरह के आदेश के परिणाम न केवल किसी व्यक्ति को ऐसी अवधि के दौरान अपने परिवार के सदस्यों के साथ अपने घर में रहने से रोक सकते हैं, बल्कि उसके आजीविका के अधिकार से भी वंचित कर सकते हैं। पीठ ने यह टिप्पणी एक व्यक्ति द्वारा दायर आवेदन पर की, जिसमें दिल्ली पुलिस द्वारा उसके खिलाफ पारित निर्वासन आदेश को बरकरार रखने वाले दिल्ली के उपराज्यपाल के आदेश को चुनौती दी गई थी।