उत्तर के बजाय दक्षिण के राज्यों में दागी नेताओं का राजनीति में दबदबा अधिक

Prabhat Kumar हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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राजनीति में दागियों की संख्या पर एक रिपोर्ट में बताया गया है कि दक्षिण के राज्यों में आपराधिक छवि वाले नेताओं की संख्या अधिक है। उदाहरण के लिए, केरल में 84% और तमिलनाडु में 54% आपराधिक छवि वाले नेता विधानसभा पहुंचे हैं। जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश में यह संख्या क्रमशः 53% और 51% है।

उत्तर के बजाय दक्षिण के राज्यों में दागी नेताओं का राजनीति में दबदबा अधिक

नई दिल्ली। राजनीति में जब भी बाहुबलियों और दागियों की बात होती तो बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी पट्टी के राज्यों के नामों की चर्चा होती है, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहते हैं। चुनावी आंकड़े बताते हैं कि उत्तर के बजाय दक्षिण के राज्यों में आपराधिक छवि वाले नेताओं का राजनीति में दबदबा अधिक है। हालांकि, राजनीति में करोड़पति नेताओं के मामले में उत्तर प्रदेश और बिहार, दक्षिण के राज्यों की तुलना में पीछे नहीं हैं। भारतीय राजनीति और चुनाव पर बारीक से नजर रखने वाली एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) द्वारा तैयार रिपोर्टों के विश्लेषण से पता चलता है कि बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे उत्तर के राज्यों के बजाय तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिण के राज्यों में चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचने वाले आपराधिक छवि वाले नेताओं की संख्या अधिक है। आंकड़े बताते हैं कि बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और मध्य प्रदेश विधानसभा में अधिकतम 54 फीसदी आपराधिक छवि वाले विधायक हैं। जबकि इसके विपरीत, तमिलनाड, केरल, तेलंगाना जैसे राज्यों के विधानसभा में 84 फीसदी तक आपराधिक छवि वाले नेता चुनाव जीतकर विधायक बने हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, झारखंड की तुलना में दक्षिण के राज्यों में चुनाव जीतने वाले नेताओं के खिलाफ गंभीर किस्म के आपराधिक मामले (जैसे हत्या, महिलाओं के खिलाफ अपराध, भ्रष्टाचार और पांच साल से अधिक सजा के प्रावधान वाले) भी अधिक हैं।

आपराधिक छवि वाले विधायक

रिपोर्ट के मुताबिक, देश के सबसे शिक्षित राज्य केरल में हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक आपराधिक छवि वाले नेताओं को जीत मिली है। यहां पर 84 फीसदी आपराधिक छवि वाले नेता चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। इनमें से 57 फीसदी नवनिर्वाचित विधायकों के खिलाफ गंभीर किस्म के आपराधिक मामले दर्ज है। जबकि, तमिलनाडु में 54 फीसदी नवनिर्वाचित विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं, इनमें से 24 फीसदी के खिलाफ गंभीर किस्म के मामले दर्ज हैं। इसी तरह, तेलंगाना के 69 फीसदी विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज है, इनमें से 50 फीसदी के खिलाफ गंभीर किस्म के आपरधिक मामले हैं।

करोड़पति विधायक

इसकी तुलना में बिहार में 53 फीसदी विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं और इनमें से 42 फीसदी के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले हैं। जबकि उत्तर प्रदेश में 51 फीसदी विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं और इनमें से 39 फीसदी के खिलाफ गंभीर किस्म के आपराधिक मामले दर्ज हैं। झारखंड में 54 फीसदी विधायकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज है और इनमें से 45 फीसदी के खिलाफ गंभीर किस्म के आपराधिक मामले हैं। इसी तरह मध्य प्रदेश में 39 फीसदी विधायकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज है और इनमें से महज 15 फीसदी के खिलाफ गंभीर किस्म के आपराधिक मामले दर्ज हैं।

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आपराधिक छवि वाले विधायक

राज्य आपराधिक मुकदमा गंभीर आपराधिक मुकदमा

केरल 84 फीसदी 57 फीसदी

तमिलनाडु 54 फीसदी 24 फीसदी

तेलंगाना 69 फीसदी 50 फीसदी

बिहार 53 फीसदी 42 फीसदी

उत्तर प्रदेश 51 फीसदी 39 फीसदी

मध्य प्रदेश 39 फीसदी 15 फीसदी

झारखंड 54 फीसदी 45 फीसदी

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करोड़पति विधायक

बिहार 90 फीसदी

यूपी 48 फीसदी

झारखंड 89 फीसदी

केरल 69 फीसदी

तेलंगाना 96 फीसदी

आंध्र प्रदेश 93 फीसदी

तामिलनाडु 83 फीसदी

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

केरल में आपराधिक छवि वाले नेताओं की कितनी प्रतिशत संख्या है?
केरल में 84 फीसदी आपराधिक छवि वाले नेता चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं।
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लेखक के बारे में

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प्रभात कुमार देश के प्रमुख कानूनी और संवैधानिक मामलों के अनुभवी पत्रकारों में से एक हैं, जो पिछले 16 वर्षों से हिन्दुस्तान के साथ जुड़े हैं। पत्रकारिता में 20+ वर्षों के अनुभव के साथ उन्होंने अदालत और कानून से जुड़े जटिल विषयों को आम पाठकों तक सरल और प्रभावी तरीके से पहुंचाने में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है।

अपने करियर की शुरुआत अदालत की रिपोर्टिंग से करने वाले प्रभात कुमार आज सुप्रीम कोर्ट, कानून मंत्रालय, भारतीय निर्वाचन आयोग, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, लोकपाल और राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण आयोग जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों को कवर करते हैं।

उनकी रिपोर्टिंग न केवल तथ्यपरक होती है, बल्कि वह जनहित और संवैधानिक मूल्यों को केंद्र में रखकर जटिल कानूनी मुद्दों को सहज भाषा में प्रस्तुत करती है।

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