
90 दिन के बजाए, 3 से 6 साल लग रहे हैं उपभोक्ता को न्याय मिलने में
प्रभात कुमार नई दिल्ली। वैध मेडिक्लेम होने के बाद भी इलाज खर्च नहीं देने पर
प्रभात कुमार नई दिल्ली। वैध मेडिक्लेम होने के बाद भी इलाज खर्च नहीं देने पर दिल्ली निवासी सहदेव राणा ने बीमा कंपनी के खिलाफ वर्ष 2019 में उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया। करीब 6 साल बाद दिल्ली की जिला उपभोक्ता अदालत ने सहदेव राणा के हक में फैसला दिया। जबकि उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत महज 90 दिन के भीतर राणा की शिकायत का निपटारा हो जाना चाहिए था। यह कहानी सिर्फ दिल्ली के सहदेव राणा की नहीं है, बल्कि देशभर के उपभोक्ता अदालतों में करीब 5 लाख से अधिक लोगों की शिकायत का भी यही है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 38 की उपधारा 7 के तहत यह प्रावधान किया गया कि उपभोक्ता के शिकायत का निपटारा जल्द से जल्द किया जाएगा।
साथ ही कहा गया कि हर उपभोक्ता अदालत प्रयास किया जाएगा कि मामले में प्रतिवादी पक्ष को नोटिस मिलने की तारीख से तीन माह के भीतर निपटारा कर दिया जाए, यदि शिकायत में सामान के एनालिसिस या टेस्टिंग की जरूरत नहीं है और यदि एनालिसिस या टेस्टिंग की जरूरत है तो 5 माह के भीतर मामले का निपटारा करने का प्रावधान किया गया। उपभोक्ता संरक्षण कानून में 3 माह के भीतर शिकायत का निपटारा किए जाने का स्पष्ट प्रावधान होने के बाद भी, उपभोक्ता अदालतों में शिकायतों के निपटारे में औसतन 3 से 6 साल तक का वक्त लग रहा है। यही हाल राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एससीडीआरसी) और राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) का भी है। हालांकि एनसीडीआरसी में मुकदमों के निपटारे में काफी तेजी आई है। एनसीडीआसी में शिकायतों/अपीलों के निपटारे की दर 125 फीसदी से भी अधिक है। केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक देशभर के उपभोक्ता अदालतों में लगभग 5 लाख से अधिक शिकायतें लंबित है। इसकी, मुख्य वजह जिला उपभोक्ता अदालतों में लगभग 700 से अधिक सदस्यों और पीठासीन अधिकारियों के पद खाली हैं। संसाधनों की कमी और खाली पदों के चलते समय से नहीं निपट रहे हैं मामले उपभोक्ता मामलों के जानकार अधिवक्ता गौरव भारद्वाज ने बताया कि उपभोक्ता अदालतों में संसाधनों की कमी और बड़े पैमाने पर पीठासीन अधिकारियों और सदस्यों के पद खाली होने के चलते शिकायतों का समय से निपटारा नहीं हो पाता है। उन्होंने कहा कि उपभोक्ता अदालतों का गठन इसलिए किया गया था ताकि लोगों को समय से त्वरित न्याय मिले और नियमित अदालतों में मुकदमों के बोझ कम हो। अधिवक्ता गौरव ने कहा कि न तो नियमित अदालतों में मुकदमों के बोझ कम हुए और न ही उपभोक्ता को समय ने न्याय मिल रहे है। इसके विपरीत, उपभोक्ता अदालत आज खुद शिकायतों के बोझ तले दब गई। कहां कितने मामले लंबित देशभर लगभग 5.5 लाख मामले लंबित एनसीडीआरसी- 2000 लगभग शिकायतों के निपटारे में आई कमी केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2022 और 2023 की तुलना में 2024 और 2025 में शिकायतों के निपटारे में कमी आई है। रिपोर्ट के मुताबिक जहां 2022 और 2023 में जितने मामले दाखिल हुए, उससे अधिक का निपटारा किया गया, लेकिन इसके विपरीत 2024 और 2025 में, जितने मामले दाखिल हुए, उससे कम मामले का निपटारा किया गया। आंकड़े 2022 दाखिल हुए 175,680 निपटारा किए गए 182,868 2023 दाखिल हुए 174,284 निपटारा किए गए 185,779 2024- दाखिल हुए 173,181 निपटारा किए गए 158,321 2025 दाखिल हुए (जुलाई तक) 78,031 निपटारा किए गए 65,537 पद खाली देशभर के 686 जिला उपभोक्ता फोरम में से लगभग 200 से अधिक पीठासीन अधिकारी के पद खाली हैं, जबकि 500 से अधिक सदस्यों के पद खाली हैं। इसमें सबसे अधिक पद उत्तर प्रदेश में 70 से अधिक सदस्य और 30 से अधिक पीठसीन अधिकारी के पद खाली हैं। इलाज खर्च दे बीमा कंपनी दिल्ली की जिला उपभोक्ता अदालत ने सहदेव राणा की शिकायत पर देर से ही सही, उनके हक में फैसला दिया है। उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी यूनाइटेड इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को 45 दिन के भीतर शिकायतकर्ता राणा को 2 लाख रुपये इलाज खर्च 9 फीसदी ब्याज सहित देने का आदेश दिया है। इसके अलावा एक लाख रुपये मुआवजा और 25 हजार रुपये मुकदमा खर्च भी देने को कहा है।

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