
बिहार चुनाव में हार से राहुल गांधी की चुनौतियां बढ़ी
- कांग्रेस को हार की समीक्षा कर तय करनी होगी जवाबदेही- पार्टी के अंदर उठने लगे है अति जातिवादी राजनीति पर सवालनई दिल्ली सुहेल हामिदबिहार में कांग्रेस का प्रदर्शन शर्मनाक रहा है। तमाम कोशिशों के बावजूद...
बिहार में कांग्रेस का प्रदर्शन शर्मनाक रहा है। तमाम कोशिशों के बावजूद कांग्रेस सिर्फ एक सीट जीतने में कामयाब रही। वोट चोरी, एसआईआर, आरक्षण सीमा खत्म करने, जाति जनगणना और ईबीसी सहित तमाम मुद्दे बेअसर साबित हुए। इन परिणाम ने जहां कांग्रेस पर रणनीति बदलने का दबाव बढा है, वहीं लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के लिए चुनौती भी बढ़ गई है। कांग्रेस ने बिहार में चुनावी रणनीति का तानाबाना राहुल गांधी की तरफ से उठाए जा रहे मुद्दों के इर्द गिर्द बुना था। उनके करीबी माने जाने वाले कृष्णा अल्लावरु को चुनाव से कुछ माह पहले प्रभारी नियुक्त किया गया।
अल्लावरु ने अपने अंदाज में टिकट बंटवारा किया और तमाम बड़े नेताओं से खुद को किनारे कर लिया। हाल ही में पार्टी से इस्तीफा देने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री शकील अहमद का कहना है कि कांग्रेस को हार की समीक्षा के साथ टिकट बंटवारे को लेकर लगे आरोपों की जांच करनी चाहिए। दरअसल, टिकट बंटवारे और चुनाव प्रचार में नजरअंदाज किए जाने से नाराज शकील अहमद ने कुछ दिन पहले पार्टी छोड़ दी थी। पार्टी के कई दूसरे बड़े नेता भी इन परिणाम को लेकर चकित नहीं है। उनका कहना है कि सिर्फ पांच नेता पूरा चुनाव लड़ा रहे थे। इसलिए, पार्टी को पांच सीट मिली है। उन्होंने कहा कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी हमारी बात नहीं सुनकर इन नेताओं की बात मान रहा था। इसलिए, प्रदेश के तमाम बडे नेता चुनाव से दूर रहे। प्रदेश के वरिष्ठ नेता किशोर कुमार झा भी मानते हैं कि कांग्रेस को अति जातिवादी होने का नुकसान उठाना पडा है। वहीं, स्थानीय नेता और कार्यकर्ताओं को चुनाव से दूर रखा गया। टिकट बंटवारे को लेकर भी कई तरह की शिकायतें रही। ऐसे में राहुल गांधी को फौरन अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करना चाहिए। इन परिणाम के बाद लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की चुनौतियां बढ़ना भी लाजिमी है। क्योंकि, राहुल पिछले कई चुनावों से जाति जनगणा और आरक्षण की सीमा को खत्म करने का मुद्दा पूरी आक्रामकता के साथ उठा रहे हैं। लगातार चुनावी हार के बाद इन मुद्दों को लेकर अब पार्टी के अंदर ही सवाल उठने लगे हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता तारिक अनवर कहते हैं कि कांग्रेस को बिहार चुनाव में शर्मनाक हार की समीक्षा करनी चाहिए। समीक्षा रिपोर्ट के आधार पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को जवाबदेही तय करते हुए सख्त कदम उठाने चाहिए। पार्टी खुद को सुधारने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाती है, तो कुछ नहीं किया जा सकता। वर्ष 2011 के बाद कांग्रेस लोकसभा और विधानसभा मिलाकर करीब 90 चुनाव हार चुकी है। इतना ही नहीं, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, सिक्किम और नागालैंड सहित पूर्वोत्तर के कई राज्यों में पार्टी का एक भी विधायक नहीं है। ऐसे में राहुल गांधी सहित कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की चुनौतियां और दबाव बढ़ना लाजिमी है। हार के कारण बड़ी रैलियां, पर वोट कम - राहुल गांधी ने सासाराम ने वोटर अधिकार यात्रा के जरिए चुनाव प्रचार की शुरुआत की । भीड़ भी जुटी, पर कांग्रेस भीड़ को वोट में बदलने में नाकाम रही। बूथ स्तर पर कमजोर - संगठन सृजन वर्ष के बावजूद कांग्रेस बूथ स्तर पर खुद को मजबूत बनाने में विफल रही है। मतदान के वक्त कई प्रमुख जिलों में बूथ पर पार्टी कार्यकर्ता तक नहीं थे। स्थानीय मुद्दों से दूरी - कांग्रेस ने चुनाव प्रचार के दौरान स्थानीय मुद्दों के बजाए दूसरे मुद्दों को तरजीह दी। जबकि एनडीए ने पूरा चुनाव प्रचार अपनी योजनाओं पर केंद्रित रखा। वोट चोरी बेसर - बिहार में वोट चोरी के आरोपों का कोई असर नहीं हुआ। राहुल गांधी ने पहले चरण के चुनाव से पहले भी एसआईआर का मुद्दा उठाया, पर यह बेअसर साबित हुआ गठबंधन में टकराव - महागठबंधन में घटकदलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर टकराव की वजह से भी कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल का आभाव रहा। यह भी एक कारण बना।

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