
संविधान पीठ: हमें अपने संविधान पर गर्व है: नेपाल और बांग्लादेश में उथल-पुथल पर सीजेआई ने की टिप्पणी
प्रभात कुमार नई दिल्ली। देश के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई ने बुधवार को ‘नेपाल
प्रभात कुमार नई दिल्ली। देश के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई ने बुधवार को ‘नेपाल में अपने ही सरकार के खिलाफ जनता के विद्रोह का जिक्र करते हुए कहा कि भारत के पड़ोसी राज्यों में जो हो रहा है, उसे देखते हुए हमें अपने संविधान पर गर्व है। सीजेआई गवई ने केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को उन आंकड़ों को पेश करने से रोकते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें दावा किया गया था कि राज्यपाल द्वारा विधानसभा से पारित बहुत कम विधेयकों को रोके गए हैं। संविधान पीठ की अगुवाई कर रहे सीजेआई गवई द्वारा की गई टिप्पणी से सहमति जताते हुए जस्टिस विक्रम नाथ ने पिछले साल पड़ोसी देश बंगलादेश में हुए विद्रोह के बाद तख्ता पलट का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि संविधान पिछले कई दशकों से काम कर रहा है अैर ‘हम 2014 से पहले और 2014 के बाद क्या हो रहा है, इस पर गौर नहीं कर रहे हैं। संविधान पीठ में शामिल जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि सवाल यह नहीं है कि एक विधेयक रोका गया है या हजार विधेयक रोके गए हैं, बल्कि सवाल यह है कि क्या राज्यपाल किसी विधेयक को अनिश्चित काल तक रोक सकते हैं। इस पर केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल मेहता ने दोहराया कि अनुच्छेद 200 में ‘रोक का मतलब है कि विधेयक पारित नहीं हो पाता या विफल हो जाता है। सीजेआई गवई की अगुवाई में गठित 5 जजों की संविधान पीठ सुप्रीम कोर्ट द्वारा 8 अप्रैल, 2025 को पारित फैसले में विधेयकों को मंजूरी देने के मुद्दे पर राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समय सीमा तय किए जाने के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए संदर्भ पर सुनवाई कर रही है। संविधान पीठ में सीजेआई गवई के अलावा, जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पी.एस. नरसिम्हा और ए.एस. चंदुरकर भी शामिल हैं। इससे पहले, केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संविधान पीठ से कहा कि ‘1970 से अब तक, आंकड़ों के अनुसार, देश भर में 17,000 से ज्यादा विधेयकों में से राज्यपालों द्वारा केवल 20 विधेयक ही रोके गए हैं। उन्होंने कहा कि 90 फीसदी विधेयकों को 1 माह से कम समय में ही, राज्यपाल ने मंजूरी दी है। मेहता ने कहा कि तो क्या यह राज्यपाल द्वारा तुरन्त इस्तेमाल की गई शक्ति नहीं है। हालांकि सॉलिसिटर जनरल मेहता द्वारा आंकड़ा पेश किए जाने पर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने आपत्ति जताते हुए कहा कि ‘जब वे आंकड़ा 2014 के बाद रोके गए/विलंबित विधेयकों का आंकड़ा पेश कर रहे थे, तब मेहता ने आपत्ति जताई थी। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि ‘लेकिन मैं 1970 से राज्यपालों के कार्यों की बात कर रहा हूं, मैं आपकी सरकारों की भी प्रशंसा कर रहा हूं। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता सिब्बल ने पलटवार किया और कहा कि ‘पहले राज्यपालों के साथ अब जैसा कुछ नहीं हुआ था। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वह आगे बढ़ेंगे, मैं आपकी तरह राजनेता नहीं हूं। सिब्बल ने दोबारा कह कि ‘आप मुझसे भी अधिक राजनीतिज्ञ हैं। मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी। राज्यपाल संविधान का संरक्षक- केंद्र केंद्र सरकार ने संविधान पीठ को बताया कि ‘अनिवार्य रूप से, राज्यपाल की भूमिका संविधान के संरक्षक, भारत संघ के संरक्षक और प्रतिनिधि और एक ऐसे व्यक्ति की होनी चाहिए जो पूरे राष्ट्र के हित को ध्यान में रखे क्योंकि वह भारत के राष्ट्रपति का प्रतिनिधित्व करता है। केंद्र ने कहा कि राज्यपाल को हर काम मंत्रिपरिषद के परामर्श और सहयोग से करना चाहिए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि माननीय न्यायाधीश को याद होगा जब केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल बहस कर रहे थे, तब उन्होंने केरल के मामले में तारीखों की एक सूची दी थी और वास्तव में, कहा था कि इसे इसी तरह काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं (मेहता) पूरी तरह से सहमत हूं कि राज्यपाल चाय पर मुख्यमंत्री से मिलते हैं, कुछ मुद्दों पर चर्चा करते हैं और संविधान इसी तरह काम करता है और इसने इसी तरह काम किया है। मेहता ने कहा कि आंकड़ों के साथ यह बताऊंगा कि संविधान इसी तरह काम करता है। हालांकि सीजेआई गवई ने पेश आंकड़े को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कानून के बिंदु पर बहस करने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि जब हम राज्यों के आंकड़े पर विचार नहीं किए तो, अब इसका कोई जरूरत नहीं। सीजेआई ने केंद्र द्वारा आंकड़े देने पर आपत्ति जताते हुए कहा कि ‘यह दूसरे पक्ष के साथ न्याय नहीं होगा क्योंकि उन्हें ऐसे किसी भी डेटा का संदर्भ देने की अनुमति नहीं दी गई थी। सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाले राज्य मंत्रिमंडल के बीच संबंध सहयोगात्मक होने चाहिए। उन्होंने राज्यपालों द्वारा विधेयकों में देरी करने के राज्य सरकारों के आरोपों को झूठा अलार्म बताकर खारिज कर दिया। सुनवाई के सीजेआई गवई ने कहा कि केंद्र सरकार से सवाल किया कि ‘आप यह कैसे कह सकते हैं राज्य ‘झूठे दावे कर रहे हैं, जबकि विधेयक 3-4 साल से राज्यपालों के पास लंबित हैं। सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि विधेयकों के अनिश्चितकालीन लंबित रहने को उचित नहीं ठहरा रहे हैं, लेकिन समय-सीमा तय करने की कोई आवश्यकता नहीं है। राज्यपाल से असंवैधानिक सलाह मानने की उम्मीद नहीं की जा सकती- केंद्र सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि ‘राज्यपाल राजनीतिक दबावों से प्रभावित नहीं हो सकते, बल्कि वे एक वरिष्ठ राजनेता हैं जिनका कर्तव्य संविधान की रक्षा करना है। उन्होंने कहा कि राज्यपालों ने, कुछ अपवादों को छोड़कर, सर्वोच्च न्यायालय और संविधान की इच्छा के अनुसार कार्य किया है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्यपाल से असंवैधानिक सलाह और सहायता मानने की उम्मीद नहीं की जा सकती। मेहता ने पीठ से कहा कि ‘कभी-कभी ऐसी परिस्थितियां आती हैं कि राज्यपाल को संविधान की रक्षा के लिए विधेयकों को मंज़ूरी देने से इनकार करना पड़ता है। उन्होंने उदाहरण के तौर पर कहा कि जब पंजाब के राज्यपाल ने 2016 में पंजाब सतलुज यमुना लिंक नहर भूमि (स्वामित्व अधिकारों का हस्तांतरण) विधेयक को मंज़ूरी देने में देरी की थी। सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि अगर यह विधेयक कानून बन जाता, तो सहकारी संघवाद और पड़ोसी देश के साथ संबंधों पर असर पड़ता। ऐसे कई उदाहरण हैं जब केंद्र और राज्य सरकारों के हितों के टकराव में राज्यपाल को एक तटस्थ निर्णायक की भूमिका निभानी पड़ती है।

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