
जज के पद को हमेशा राष्ट्र सेवा माना : सीजेआई
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने अपने विदाई भाषण में कहा कि उन्होंने न्यायपालिका को शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र की सेवा का माध्यम माना। गवई ने पर्यावरण और न्याय के मुद्दों पर अपने अनुभव साझा किए और अपने कार्यकाल के दौरान मिले अवसरों के प्रति आभार व्यक्त किया। उनका कार्यकाल 14 मई 2023 को शुरू हुआ था।
देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बी.आर. गवई ने शुक्रवार को कहा कि उन्होंने जज के पद को कभी भी शक्ति के रूप में नहीं बल्कि राष्ट्र की सेवा का जरिया माना है। उन्होंने कहा कि मेरा यह मानना कि हर पद, देश की सेवा का एक अवसर है और मैंने यही करने की कोशिश की। सीजेआई गवई सुप्रीम कोर्ट द्वारा उन्हें विदाई देने के लिए आयोजित सेरेमोनियल बेंच को संबोधित कर रहे थे। अपने आखिरी कार्य दिवस पर सीजेआई गवई ने कहा कि कैसे एक अधिवक्ता से जज बनने के उनके सफर ने कानून और न्याय के कभी न खत्म होने वाले सागर के प्रति उनकी समझ को भी बढ़ाया।
उन्होंने कहा कि मैं इस मौके पर आप सभी का शुक्रिया अदा करना चाहूंगा। जस्टिस गवई ने कहा कि 1985 में जब मैं इस पेशे से जुड़ा था तो मैं कानून के छात्र के रूप में आया था और अब न्याय के छात्र के तौर पर विदा ले रहा हूं। सीजेआई गवई 23 नवंबर रविवार को सेवानिवृत होंगे। अपने विदाई भाषण में उन्होंने उल्लेख किया कि कैसे वह अक्सर डॉ. बी.आर. आंबेडकर की शिक्षाओं और 25 नवंबर, 1949 के उनके भाषण से प्रेरणा लेते थे। सीजेआई बीआर गवई की विदाई के दौरान एक अधिवक्ता ने उन पर फूलों की बारिश करने की इजाजत मांगी। इस पर सीजेआई ने मुस्कराते हुए उन्हें रोक दिया। ऐसे विषयों पर निर्णय दिए जो दिल के करीब थे सीजेआई ने कहा कि कैसे उन्हें पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के विषयों में न्याय देने का अवसर मिला, जो उनके दिल के करीब था। उन्होंने याद किया कि हाईकोर्ट के जज के रूप में अपने पहले फैसलों में से एक में वह पर्यावरणीय स्थिरता के पहलुओं पर निर्णय लेने में सक्षम थे। शीर्ष अदालत के 75 वर्ष पूरे होने पर ‘कप्तानी’ करना सौभाग्य सीजेआई ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की स्थापना के 75 साल पूरे होने के अवसर पर ‘न्यायपालिका के कप्तान’ के रूप में प्रतिनिधित्व करना उनके लिए बहुत बड़े सौभाग्य की बात है। सीजेआई ने अपने परिवार, अपने कोर्ट स्टाफ और अपने 18 विधि क्लर्कों को धन्यवाद देकर संबोधन समाप्त किया। दलित समुदाय से आने वाले दूसरे सीजेआई हैं जस्टिस गवई बौद्ध धर्म को मानने वाले देश के पहले सीजेआई हैं, जबकि दलित समुदाय से आने वाले दूसरे सीजेआई हैं। सीजेआई के तौर पर जस्टिस गवई का कार्यकाल 6 माह से अधिक रहा है। उन्होंने इसी साल 14 मई को इस पद का कार्यभार संभाला था। उन्हें 24 मई, 2019 को पदोन्नति देकर बॉम्बे हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में जज बनाया गया था। सीजेआई गवई का जन्म 24 नवंबर 1960 को महाराष्ट्र के अमरावती में हुआ। वह एक राजनीतिक परिवार से हैं। उनके पिता रामकृष्ण गवई एमएलसी, लोकसभा सांसद और 3 राज्यों के राज्यपाल रहे। जस्टिस गवई 2003 में बॉम्बे हाईकोर्ट के जज नियुक्त हुए थे। संविधान पीठ ने 110 पेज में सब कुछ जवाब दे दिया : सॉलिसिटर जनरल सीजेआई को विदाई देने के लिए आयोजित सेरेमोनियल पीठ के समक्ष अपनी बात रखते हुए कहा कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने राष्ट्रपति के संदर्भ मामले में संविधान पीठ के फैसले का जिक्र किया। मेहता ने कहा कि आपने (सीजेआई) कहा कि हमारा अपना न्यायशास्त्र है और संविधान पीठ के फैसले ने सिर्फ 110 पेज में सब कुछ जवाब दे दिया। यह एक नई बात है। कार्यवाही की शुरुआत भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने यह कहते हुए कि सीजेआई गवई ने उन सभी इंस्टीट्यूशन्स के लिए ‘भूषण’ बनकर अपने पहले नाम के साथ सच्चा न्याय किया, जिनसे वे जुड़े। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ऐतिहासिक रूप से एक ‘अभिजात्य न्यायालय’ रहा है, लेकिन सीजेआई गवई का इस पद पर पहुंचना साबित करता है कि किसी भी पृष्ठभूमि का व्यक्ति सर्वोच्च संवैधानिक पदों की आकांक्षा रख सकता है।

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