नियुक्तियों पर फैसले लालू के आधिकारिक दायरे में नहीं आते : सीबीआई

Jan 13, 2026 10:00 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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सीबीआई ने दिल्ली हाईकोर्ट में राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की एफआईआर रद्द करने की याचिका का विरोध किया। सीबीआई का कहना है कि रेलवे में नियुक्तियों के फैसले उनके आधिकारिक कार्यों का हिस्सा नहीं थे। 2004 से 2009 के बीच नौकरी के बदले जमीन हस्तांतरित करने के मामले में लालू प्रसाद और उनके परिवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।

नियुक्तियों पर फैसले लालू के आधिकारिक दायरे में नहीं आते : सीबीआई

नई दिल्ली, एजेंसी। जमीन के बदले नौकरी मामले में राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की एफआईआर रद्द करने की याचिका का सीबीआई ने विरोध किया है। सीबीआई ने मंगलवार को दिल्ली हाईकोर्ट से कहा कि रेलवे में नियुक्तियों से जुड़े फैसले लालू प्रसाद के आधिकारिक कर्तव्यों का हिस्सा नहीं थे। ऐसे निर्णय केवल रेलवे के महाप्रबंधक ही ले सकते थे, न कि रेल मंत्री। जस्टिस रविंदर डुडेजा के समक्ष सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने दलील दी कि इस मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत पूर्व स्वीकृति लेने की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने कहा कि लालू प्रसाद द्वारा की गई कथित सिफारिशें या फैसले उनके आधिकारिक कार्यों के दायरे में नहीं आते।

रेलवे में नियुक्तियों का अधिकार केवल संबंधित जोन के महाप्रबंधकों के पास होता है और मंत्री की इसमें कोई भूमिका नहीं होती। इसलिए नियुक्तियों से जुड़े किसी भी निर्णय को लालू प्रसाद के सार्वजनिक कर्तव्यों से नहीं जोड़ा जा सकता। सीबीआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल डीपी सिंह ने बताया, संबंधित महाप्रबंधकों के खिलाफ कार्रवाई के लिए आवश्यक स्वीकृति विधिवत प्राप्त की गई है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह के लिए तय की है। यह है मामला -रेलवे के पश्चिम मध्य क्षेत्र, जबलपुर में ग्रुप-डी पदों पर की गई नियुक्तियों से जुड़ा है। सीबीआई के अनुसार, वर्ष 2004 से 2009 के बीच लालू प्रसाद के रेल मंत्री रहते हुए कुछ लोगों को नौकरी के बदले उनकी पत्नी, बेटियों या करीबी सहयोगियों के नाम जमीन हस्तांतरित की गई। इस मामले में 18 मई 2022 को लालू प्रसाद, उनके परिवार के सदस्यों और अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। -लालू प्रसाद यादव ने हाईकोर्ट में एफआईआर और 2022, 2023 व 2024 में दाखिल तीनों चार्जशीट रद्द करने की मांग की है। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि बिना पूर्व स्वीकृति के जांच और चार्जशीट कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं हैं और यह कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है।

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