हाईकोर्ट ने दुष्कर्मी पिता की उम्रकैद बरकरार रखी
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक पिता के दावे को खारिज कर दिया कि उसकी नाबालिग बेटी ने गुस्से में आकर उस पर दुष्कर्म का आरोप लगाया। अदालत ने उसकी उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि एक बच्चा केवल नाराजगी के कारण अपने पिता पर इतने गंभीर आरोप नहीं लगा सकता।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को एक पिता के इस दावे को ‘बेहद अकल्पनीय’ बताया कि उसकी नाबालिग बेटी ने उस पर दुष्कर्म का आरोप केवल गुस्से में आकर लगाया था। न्यायमूर्ति मनीष पिटाले और श्रीराम शिरसात की खंडपीठ ने उस व्यक्ति की उम्रकैद बरकरार रखते हुए, उसकी याचिका खारिज कर दी। याचिका में उसने मार्च 2020 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे कई मौकों पर अपनी नाबालिग बेटी से दुष्कर्म के लिए पॉक्सो अदालत द्वारा उम्रकैद दी गई थी।याचिका में तर्क दिया गया कि उसकी बेटी ने उसे इसलिए फंसाया क्योंकि उसने उसे पढ़ाई बीच में ही छोड़ने के लिए मजबूर किया था, जिसे उसने माता-पिता द्वारा अनुशासनात्मक कार्रवाई बताया और जिसके कारण उसकी बेटी में नाराजगी पैदा हुई।
हालांकि, हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि उसका यह सिद्धांत स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि एक बच्चा अपने माता-पिता से नाराज हो सकता है, जैसा कि तब होता है जब माता-पिता अपने बच्चे को अनुशासित करना चाहते हैं। पीठ ने कहा कि यह मानना गलत होगा कि सिर्फ इसी वजह से पीड़िता ने अपने ही पिता पर इतने गंभीर और दूरगामी (दुष्कर्म) के आरोप लगाए।मुंबई में 2018 में अपने स्कूल में आयोजित ‘पुलिस दीदी’ जागरूकता कार्यक्रम के दौरान एक परामर्शदाता से बातचीत करते हुए, उस नाबालिग लड़की ने, जो उस समय कक्षा 10 की छात्रा थी, अपने पिता द्वारा वर्षों से किए जा रहे यौन शोषण की जानकारी दी। पुलिस से शिकायत में पीड़िता ने कहा था कि उसने अपनी मां को कई बार आपबीती बताई थी लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया। इसके बाद पुलिस ने आरोपी पिता को गिरफ्तार कर लिया।
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