एआई जज की जगह नहीं ले सकता : जस्टिस माहेश्वरी
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस दिनेश माहेश्वरी ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) न्यायिक प्रणाली में जज की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने एआई को सहायक उपकरण के रूप में मानते हुए कहा कि इंसानी समझ और संवेदना की आवश्यकता है। न्याय प्रणाली में एआई का सोच-समझकर इस्तेमाल करने की आवश्यकता है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस दिनेश माहेश्वरी ने स्पष्ट तौर पर कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) न्यायिक प्रणाली में जज की जगह नहीं ले सकता है। उन्होंने कहा कि एआई सिर्फ न्याय प्रणाली में सहायक की भूमिका निभा सकता है। जस्टिस माहेश्वरी इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में ‘भारतीय न्याय प्रणाली को बदलने के लिए एआई का इस्तेमाल’ परिचर्चा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि ज्ञान को बढ़ाने और काम में मदद करने का एक सहायक उपकरण है, लेकिन यह इंसानी समझ की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एआई में स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता नहीं होती और न ही इसमें मानवीय संवेदना या परिस्थितियों की भावनात्मक समझ है, जो न्याय के लिए जरूरी है।
राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, दिल्ली द्वारा आयोजित परिचर्चा में करीब सभी वक्ताओं ने माना कि न्यायिक प्रणाली में एआई को जिम्मेदार और सोच-समझकर शामिल किया जाना चाहिए। एआई तक सभी की पहुंच हो : कुलपति राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जीएस बाजपेयी ने बताया कि इस परिचर्चा में यह बात निकलकर सामने आई है कि एआई तक सभी की पहुंच हो। उन्होंने कहा कि एआई के इस्तेमाल के लिए हमें न्याय प्रणाली में उस क्षेत्र की पहचान करने और उस पर कार्य करने की जरूरत है ताकि लोगों को त्वरित न्याय मिले। प्रो. बाजपेयी ने कहा कि एआई के इस्तेमाल की एक समग्र नीति और संस्थानिक बनाने की जरूरत है। उन्होंने यह भी बताया कि अन्य क्षेत्र में एआई ने काफी ग्रोथ किया है, लेकिन न्याय पालिका में अभी वक्त लगेगा। उन्होंने कहा कि न्याय प्रणाली थोड़ा कंजरवेटिव होता है, इस क्षेत्र में एआई का अन्य क्षेत्रों की तरह विकसित नहीं हुआ है। न्याय प्रणाली में एआई का इस्तेमा सोच-समझ कर हो : डॉ. शार्दुल शार्दुल अमरचंद मंगलदास के संस्थापक और कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. शार्दुल श्रॉफ ने कहा कि न्याय प्रणाली में एआई को जिम्मेदारी के साथ सोच-समझकर शामिल किया जाना चाहिए। क्या एआआई टूल्स का इस्तेमाल न्यायिक फैसला लेने में किया जा सकता है? इस सवाल के जवाब में डॉ. श्रॉफ ने कहा कि इंसानी निगरानी की जरूरत है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि फैसले पूरी तरह से मशीनों द्वारा दिए जा रहे हैं, और पूछा कि क्या न्याय प्रक्रिया के आखिर में कोई इंसान होगा जो आखिरी फैसला सुनाएगा। उन्होंने कहा कि यदि फैसला मशीन से होता है, तो यह खराब कानून होगा क्योंकि किसी ने भी यह अधिकार मशीन को नहीं दिया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक अधिकार ऑटोमेटेड सिस्टम यानी मशीनों को नहीं दिए जा सकते। इस सत्र में जस्टिस माहेश्वरी, प्रो. बाजपेयी, डॉ. श्रॉफ, के अलवा आर्य त्रिपाठी, एनएलयू के प्रो. अपराजिता भट्ट, टीईआरईएस के विकास महेंद्र, एनईजीडी के रजनीश कुमार शामिल थे। एआई की मदद से मामलों का निपटारा तेजी से हो सकता है इस सत्र में सभी वक्ताओं ने माना कि एआई भारतीय न्याय प्रणाली की दक्षता में सुधार, पहुंच बढ़ाकर मामलों का निपटारा तेजी से कर सकता है और इसे लोगों का भरोसा और मजबूत होगा। इसमें केस प्रबंधन, विवाद समाधान और नागरिकों के लिए कानूनी सेवाओं जैसे प्रैक्टिकल इस्तेमाल पर चर्चा केंद्रित रहा। वक्ताओं ने जिम्मेदारी से काम पक्का करने के लिए गवर्नेंस फ्रेमवर्क, नैतिक सुरक्षा उपायों और जवाबदेही के तरीकों के महत्व पर जोर दिया। एआई सिर्फ सहायक टूल के तौर पर काम करे परिचर्चा के अंत में वक्ताओं ने माना कि मुकदमों के बोझ कम करने और मामलों के त्वरित निपटारे में एआई के इस्तेमाल के तरीकों पर जोर दिया। साथ ही न्यायिक आजादी और कानून के राज में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए। बातचीत में यह आम सहमति दिखी कि एआई को न्यायिक तर्क के विकल्प के बजाय एक सहायक टूल के तौर पर काम करना चाहिए।

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