Hindi Newsएनसीआर NewsMCD recommended to replace 20 per cent firewood with cow dung cakes to Cremation grounds
दिल्ली नगर निगम ने श्मशान घाटों को दी खास सलाह, लकड़ी की जगह इस चीज का इस्तेमाल करने को कहा

दिल्ली नगर निगम ने श्मशान घाटों को दी खास सलाह, लकड़ी की जगह इस चीज का इस्तेमाल करने को कहा

संक्षेप:

एक अधिकारी ने बताया कि अगर दिल्ली के श्मशान घाटों में लकड़ी का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद कर दिया जाए, तो कुल मिलाकर प्रतिदिन लगभग चार लाख किलो गोबर के उपलों की जरूरत पडे़गी, हालांकि फिलहाल इसकी आपूर्ति काफी कम है।

Thu, 24 July 2025 09:09 PMSourabh Jain पीटीआई, नई दिल्ली
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दिल्ली नगर निगम (MCD) ने अपने अधीन आने वाले श्मशान घाटों को एक महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए दाह संस्कार के दौरान लगने वाली कुल लकड़ी में 20 प्रतिशत गोबर से बने उपले का इस्तेमाल करने को कहा है। अधिकारियों का कहना है कि यह कदम पर्यावरण को बेहतर बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है। खास बात यह है कि इन उपलों या गो-काष्ट को गोबर के साथ साथ पराली मिलाकर तैयार किया जाएगा। जिसके चलते यह दोहरे तरीके से पर्यावरण को बचाने में काम आएगा। एक तो इसमें पराली इस्तेमाल हो जाएगी और अंत्येष्टि में जलाई जाने वाली लकड़ी को भी बचाया जा सकेगा। अधिकारियों का कहना है कि हम 20 प्रतिशत गोबर के उपलों से शुरुआत कर रहे हैं, और अगर यह प्रयोग सफल रहता है तो आगे इसकी मात्रा और भी बढ़ाई जाएगी।

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इस बारे में जानकारी देते हुए एक वरिष्ठ अधिकारी ने पीटीआई-भाषा को बताया कि इस योजना के तहत गोबर और पराली को मिलाकर दो से तीन फीट के लकड़ी जैसे टुकड़े तैयार किए जाएंगे, जो कि बेहतर ज्वलनशील होंगे। अधिकारी ने बताया कि कई गैर-सरकारी संगठनों और निजी संगठनों ने भी इस पहल का समर्थन करते हुए गोबर और पराली को मिलाकर 'गोबर काष्ट' बनाने में रुचि दिखाई है।

एक वरिष्ठ एमसीडी अधिकारी ने कहा कि इस पहल के पर्यावरणीय और तार्किक दोनों फायदे हैं। इस कदम से ना केवल लकड़ी पर निर्भरता कम होगी, बल्कि शहर में मौजूद डेयरियों में बड़े पैमाने पर उत्पन्न होने वाले गोबर के प्रबंधन में भी मदद मिलेगी। साथ ही उन्होंने कहा कि हालांकि लोग गाय के गोबर को एक पवित्र सामग्री मानते हैं, लेकिन दाह संस्कार के लिए इसकी स्वीकार्यता भी अब धीरे-धीरे विकसित हो रही है, हालांकि इसे पूरी तरह से अपनाने में अभी थोड़ा वक्त लगेगा।

अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने पारंपरिक लकड़ी की जगह शुरुआत में 20 प्रतिशत गोबर के उपलों का इस्तेमाल करने की सलाह दी है। हालांकि इन उपलों की आपूर्ति की स्थिति और जनता की प्रतिक्रियाओं के आधार पर धीरे-धीरे इस हिस्से को 30, 40 या 50 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है।

एक अन्य अधिकारी ने बताया कि एमसीडी द्वारा हाल ही में एक बैठक हुई थी, जिसमें स्वास्थ्य विभाग, बागवानी विभाग, गोबर आधारित वस्तुओं के निर्माता, गैर-सरकारी संगठन और अन्य विशेषज्ञ शामिल हुए थे। इसी बैठक में लकड़ी की जगह गोबर से बनी गो-काष्ट का इस्तेमाल करने को लेकर चर्चा की गई।

बैठक में स्वास्थ्य विभाग ने भी नगर निगम के इस कदम का समर्थन किया है। विभाग के एक अधिकारी ने कहा, 'इस अवधारणा में दम है, लेकिन गोबर के उपले की ज्वलनशीलता बड़ी चुनौतियों में शामिल है, क्योंकि गोबर के उपले नमी को जल्दी सोख लेते हैं और इनकी आपूर्ति भी अनियमित होती है। इन्हीं सब बाधाओं को देखते हुए कई श्मशान घाटों में इस विचार को पहले ही छोड़ दिया गया था।'

विभाग के अनुमान के अनुसार, अगर दिल्ली के श्मशान घाटों में लकड़ी का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद कर दिया जाए, तो कुल मिलाकर प्रतिदिन लगभग चार लाख किलोग्राम गोबर के उपलों की जरूरत पडे़गी, हालांकि, वर्तमान समय में इसकी आपूर्ति केवल 10,000 किलोग्राम प्रतिदिन है। जो कि मांग और आपूर्ति के बीच के एक महत्वपूर्ण अंतर को दिखाता है।

एक अधिकारी ने बताया, 'नगर निगम दिल्ली और एनसीआर के 100 किलोमीटर के दायरे में स्थित डेयरियों से गोबर मंगवाता है, क्योंकि शहर में इसका उत्पादन कम है। डेयरियों में निकलने वाला ज्यादातर गोबर लोग नालियों में बहा देते हैं, जिससे ना केवल वह किसी काम आता है, बल्कि उससे जल प्रदूषण भी होता है, जबकि दाह संस्कार के लिए इसका इस्तेमाल करना कहीं ज्यादा बेहतर विकल्प है।'

उधर इस बारे में एक श्मशान घाट संचालक ने कहा, 'हमारे पास गोबर के उपले उपलब्ध हैं, लेकिन ज्यादातर लोग अभी भी लकड़ी से दाह संस्कार करना पसंद कर रहे हैं। ऐसे में अगर कोई गोबर के उपले मांगता है, तो हम 10 किलोग्राम मुफ्त देते हैं, और इसके बाद 7 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से उन्हें देते हैं। यह व्यवस्था पिछले तीन-चार सालों से चल रही है।'

बता दें कि दिल्ली के 12 जोन में फिलहाल 59 श्मशान घाट हैं, जिनमें लकड़ी और सीएनजी से चलने वाले दोनों तरह के श्मशान शामिल हैं। सिटी-एसपी, शाहदरा और दक्षिणी दिल्ली, नगर निगम के उन चार जोन्स में शामिल हैं जहां पर स्थित लगभग 10 श्मशान घाट पहले से ही ईंधन के रूप में गाय के गोबर के उपलों का उपयोग कर रहे हैं।

Sourabh Jain

लेखक के बारे में

Sourabh Jain
सौरभ जैन पत्रकारिता में लगभग 15 वर्ष से जुड़े हुए हैं। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत जुलाई 2009 में ZEE24 छत्तीसगढ़ न्यूज चैनल से की थी। इसके बाद वे IBC24 और दैनिक भास्कर जैसी संस्थाओं में भी सेवाएं दे चुके हैं। सौरभ साल 2023 से लाइव हिन्दुस्तान से जुड़े हुए हैं और यहां पर स्टेट डेस्क में कार्यरत हैं। सौरभ मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के रहने वाले हैं और उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई और ग्रेजुएशन दोनों यहीं से किया है। इसके बाद उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में मास्टर्स की डिग्री ली है। सौरभ को राजनीति, बॉलीवुड और खेल की खबरों में विशेष रुचि है। और पढ़ें
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