अयोध्या फैसला रद्द करने की उठाई थी मांग, मुश्किल में वकील प्राचा; कुर्की का आदेश
अयोध्या फैसले को रद्द करने की याचिका लगाने वाले अधिवक्ता महमूद प्राचा की मुश्किलें बढ़ गई हैं। पटियाला हाउस कोर्ट ने जुर्माने की वसूली के लिए उनकी चल संपत्ति कुर्क करने के वारंट जारी कर दिए हैं।

निखिल पाठक, नई दिल्ली
अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रद्द करने की याचिका दाखिल करने पर लगाए गए छह लाख रुपये का जुर्माने नहीं भरने पर अधिवक्ता महमूद प्राचा की मुश्किलें बढ़ गई हैं। पटियाला हाउस कोर्ट ने जुर्माने की वसूली के लिए अधिवक्ता की चल संपत्ति कुर्क करने के वारंट जारी करने का आदेश दिया है। जरूरत पड़ने पर कुर्की वाला अधिकारी ताले भी तोड़ सकता है। अदालत ने नई दिल्ली जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (एनडीएलएसए) की ओर से दाखिल वसूली याचिका पर यह आदेश दिया।
संपत्ति की कुर्की का वारंट
अतिरिक्त वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश मेधा आर्या की अदालत ने कहा कि प्राचा को कई मौके दिए जाने के बावजूद उन्होंने अब तक कोई आपत्ति दाखिल नहीं की है। इसके बाद अदालत ने छह लाख रुपये की निर्धारित रकम तक उनकी चल संपत्ति की कुर्की के वारंट जारी करने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई एक अक्तूबर को होगी।
पूर्व सीजेआई की बातों को बनाया था आधार
दरअसल, प्राचा ने एक दीवानी अदालत में याचिका दाखिल कर अयोध्या भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2019 के फैसले को रद्द करने करने की मांग की थी। उन्होंने पूर्व मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ की वर्ष 2024 में कही गई बातों को आधार बनाते हुए मामले की दोबारा सुनवाई कराने की मांग की थी।
नए सिरे से सुनवाई की उठाई थी मांग
प्राचा का दावा था कि पूर्व सीजेआई ने एक भाषण में कहा था कि अयोध्या मामले में फैसला देने के दौरान उन्हें भगवान रामलला से समाधान मिला था। इसके आधार पर उन्होंने मामले की नए सिरे से सुनवाई की मांग की थी। प्राचा ने अपनी याचिका में भगवान रामलला को भी प्रतिवादी बनाया था।
अदालत ने ठोंका था एक लाख का जुर्माना
हालांकि, पटियाला हाउस कोर्ट के सिविल जज ने उनकी याचिका खारिज करते हुए इसे न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का मामला माना और एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया था। इसके बाद प्राचा ने इस आदेश को जिला अदालत में चुनौती दी, जहां उनके ऊपर पांच लाख रुपये का अतिरिक्त जुर्माना लगाया गया। इस तरह कुल जुर्माना छह लाख रुपये हो गया।
याचिका को बताया न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग
जिला अदालत ने अपने फैसले में प्राचा की याचिका को ‘तुच्छ, गलत धारणा पर आधारित और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग’ बताया था। अदालत ने कहा था कि पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने अपने भाषण में अयोध्या फैसले के संबंध में भगवान से प्रार्थना करने का जिक्र किया था, न कि भगवान रामलला का। कोर्ट ने इसे आध्यात्मिक अनुभव बताया था और कहा था कि व्यक्तिगत आस्था के तहत ईश्वर से मार्गदर्शन मांगना कानूनी तौर पर धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता।


