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किस्सा दिल्ली का: महरौली का जमाली-कमाली मकबरा, जहां है भूतों का साया! बेहद रोचक है कहानी

किस्सा दिल्ली का: महरौली का जमाली-कमाली मकबरा, जहां है भूतों का साया! बेहद रोचक है कहानी

संक्षेप:

Kissa Dilli Ka Part-25: 'किस्सा दिल्ली का' सीरीज के पार्ट-25 में आज हम दिल्ली के 'जमाली-कमाली मकबरे' की रोचक कहानी बता रहे हैं। ये मकबरा मुगल काल में बनाया गया था।

Oct 23, 2025 02:04 pm ISTAnubhav Shakya लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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दिल्ली शहर अपने सीने में अनगिनत कहानियां समेटे हुए है। गलियों में गूंजती सूफी कविताओं से लेकर किलों की दीवारों पर लिखी विजय गाथाओं तक, हर कोना एक नई दास्तान सुनाता है। इन्हीं में से एक है महरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क में छिपा 'जमाली-कमाली मकबरा', जहां कुव्वत-उल-इस्लाम की मीनारों की छाया में एक प्रेम कथा सांस लेती है। जितना अजीब इस मकबरे का नाम है उतनी ही रोचक इसकी कहानी भी है।

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किसके नाम पर है मकबरा?

1528-29 के दौर में, जब बाबर का मुगल साम्राज्य दिल्ली की मिट्टी में जड़ें जमा रहा था, एक सूफी संत अपनी कविताओं से इतिहास रच रहा था। शेख हमीद बिन फजलुल्लाह, जिन्हें ‘जमाली’ के नाम से जाना जाता है, सिकंदर लोदी के दरबार से होते हुए बाबर और हुमायूं के आध्यात्मिक मार्गदर्शक बने। जमाली ने इस मस्जिद को बनवाया, जो लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से सजी है। इसकी मेहराबों पर कुरान की आयतें हैं और चारों कोनों पर अष्टकोणीय मीनारें हैं।

आखिर कमाली कौन थे?

कहानी का सबसे रोमांचक पहलू है कमाली, जिनकी पहचान इतिहास के पन्नों में धुंधली सी रह गई है। कुछ कहते हैं, कमाली जमाली के शिष्य थे। वहीं कुछ उन्हें उनकी पत्नी मानते हैं, जो जमाली से पहले दुनिया छोड़ गईं। लोककथाएं तो उन्हें प्रेमी जोड़ा बताती हैं, हालांकि इतिहास इसकी पुष्टि नहीं करता। ‘कमाली’ नाम उर्दू में ‘चमत्कार’ का प्रतीक है और यही चमत्कार इस मकबरे को खास बनाता है। 1535 में गुजरात अभियान के दौरान जमाली की मृत्यु के बाद, हुमायूं ने उनके सम्मान में यह मकबरा बनवाया। 7.6 मीटर की यह चौकोर संरचना मस्जिद के उत्तर में खड़ी है, जहां दो संगमरमर की कब्रें हैं – एक जमाली की, दूसरी कमाली की।

जमाली कमाली मकबरा

भूतिया है मकबरा!

यह स्थान सिर्फ इतिहास का गवाह नहीं, बल्कि रहस्यों का खजाना भी है। स्थानीय लोग इसे ‘भूतिया मस्जिद’ कहते हैं, जहां रात के सन्नाटे में फुसफुसाहटें, ठंडी हवाओं का स्पर्श, और कभी-कभार दिखने वाली परछाइयां जिन्नों की मौजूदगी का दावा करती हैं। कुछ कहते हैं, मकबरे और सीढ़ियों को तालों में बंद रखा जाता है ताकि ये जिन्न शरारत न करें। यही रहस्य पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है।

Anubhav Shakya

लेखक के बारे में

Anubhav Shakya
भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद जी न्यूज से करियर की शुरुआत की। इसके बाद नवभारत टाइम्स में काम किया। फिलहाल लाइव हिंदुस्तान में बतौर सीनियर कंटेंट प्रोड्यूसर काम कर रहे हैं। किताबों की दुनिया में खोए रहने में मजा आता है। जनसरोकार, सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों में गहरी दिलचस्पी है। एनालिसिस और रिसर्च बेस्ड स्टोरी खूबी है। और पढ़ें
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