'काकोरी' के नाट्य मंचन में जीवंत हो उठी सशस्त्र क्रांति की गाथा, NSD में गूंजते रहे देशभक्ति के नारे
नाट्य प्रस्तुति की विशेषता यह रही कि यह केवल काकोरी की घटना तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध प्रतिरोध की परंपरा को भी दर्शाया गया। मंचन में तिलका मांझी, रामजी गोंड, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जैसे अन्य ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के संघर्ष और योगदान की झलक भी प्रस्तुत की गई।

चंद्रशेखर का पता क्या बताऊं, उनका तो नाम ही आजाद है...। मैं भले ही मुसलमान हूं, पर मेरा मुल्क हिंदुस्तान है। काकोरी के नाट्य मंचन के दौरान ऐसे तमाम संवादों को सुन लोग देशभक्ति से रोमांचित होते नजर आए। मौका था 'काकोरी क्रांति गाथा' के नाट्य मंचन का। दिल्ली के मंडी हाउस में स्थित नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के अभिमंच सभागार में आयोजित इस मंचन में क्रांतिकारी राजेंद्र लाहिड़ी, रोशन सिंह ठाकुर, चंद्रशेखर आजाद और अशफाक उल्ला खान के किरदारों ने समां बांध दिया। काकोरी में अंग्रेजी हुकूमत के खजाने को क्रांतिकारियों द्वारा लूटने वाले प्रकरण का ऐसा जीवंत मंचन किया गया कि भारत माता की जय के नारों से हॉल गूंजने लगा।
इस नाटक की पटकथा लिखने वाले रविशंकर ने कहा कि हमने सशस्त्र क्रांति का महत्व आज की पीढ़ी के सामने रखने के लिए इसे तैयार किया है। उन्होंने कहा कि यह समझने की जरूरत है कि भारत की आजादी के लिए कोने-कोने में किस प्रकार संघर्ष हुआ। कुछ नायकों को तो सभी जानते हैं, लेकिन कैसे गुमनाम नायकों ने भी इसमें अहम भूमिका अदा की। उन्होंने कहा कि भारत की स्वतंत्रता में सशस्त्र आंदोलन की भूमिका को समझने का सबसे अहम प्रकरण काकोरी हो सकता है, जिसको केंद्र में रखते हुए यह कथानक बुना गया है।
'काकोरी' नाटक में दिखाया गया कि कैसे अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए वनों में बिरसा मुंडा और तिलका मांझी जैसे नायकों ने मोर्चा संभाला तो वहीं दिल्ली, झांसी समेत तमाम शहरों में भी क्रांतिकारी उठ खड़े हुए। करीब डेढ़ घंटे के नाट्य मंचन में ही 1785 में तिलका मांझी के विद्रोह से लेकर काकोरी तक के प्रकरण को ऐसे प्रदर्शित किया गया कि सभागार में पहुंचे मासूम बच्चे भी रोमांचित हो उठे। इस प्रकार भारत की स्वतंत्रता के लिए चले लगभग 160 सालों के आंदोलन को इस नाट्य मंचन में दर्शाया गया। भविष्य में इस नाटक का मंचन देश के अन्य हिस्सों में भी किए जाने की तैयारी है।
इस आयोजन के दौरान स्वामी दीपांकर जैसी आध्यात्मिक हस्ती मौजूद थी तो वहीं पूर्व सांसद सत्यपाल सिंह भी पूरे कार्यक्रम के दौरान उपस्थित रहे। गुजरात सरकार के पूर्व मिनिस्टर नरेश रावल भी कार्यक्रम में पहुंचे। इसके अतिरिक्त समाज के विभिन्न वर्गों से बड़ी संख्या में बौद्धिक वर्ग, नीति-निर्माता, शिक्षाविद, सांस्कृतिक कर्मी और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
तिलका मांझी, रामजी गोंड और डॉ. हेडगेवार का किरदार भी आया नजर
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 9 अगस्त 1925 को घटित काकोरी प्रतिरोध एक ऐतिहासिक घटना थी, जब भारतीय क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सरकार के खजाने से भरी ट्रेन को काकोरी के निकट रोककर अपने कब्जे में लिया। इस साहसिक कार्रवाई में पं. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, चंद्रशेखर आजाद और मन्मथनाथ गुप्त जैसे क्रांतिकारियों ने भाग लिया था। इस नाट्य प्रस्तुति की विशेषता यह रही कि यह केवल काकोरी की घटना तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध प्रारम्भिक प्रतिरोध की व्यापक परंपरा को भी दर्शाया गया। मंचन में तिलका मांझी, रामजी गोंड, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जैसे अन्य ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के संघर्ष और योगदान की झलक भी प्रस्तुत की गई।
कहां से मिली काकोरी की पटकथा लिखने की प्रेरणा
कार्यक्रम के अंत में सभ्यता अध्ययन केंद्र के उपाध्यक्ष प्रकाश चंद्र शर्मा ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के बारे में जो कथा लंबे समय तक प्रस्तुत की जाती रही है, वह आंशिक सत्य और एक प्रकार की धारणा का परिणाम है। यह नाट्य प्रस्तुति उस व्यापक ऐतिहासिक वास्तविकता को सामने लाने का प्रयास है। नाटक की पटकथा सभ्यता अध्ययन केंद्र के निदेशक रवि शंकर ने गहन ऐतिहासिक अध्ययन के आधार पर लिखी है, जबकि इसका निर्देशन प्रियंका शर्मा ने किया।
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