जैसे मुझे घर से निकाला जा रहा हो, किरण बेदी ने बीजेपी सरकार के फैसले पर बताया अपने दिल का दर्द
पूर्व आईपीएस ऑफिसर किरण बेदी ने जिमखाना क्लब को खाली करने के केंद्र की बीजेपी सरकार के फैसले पर फिर अपनी नाराजगी जताई है। बेदी ने कहा कि इस आदेश को सुनने के बाद उन्हें ऐसा लगा, जैसे उन्हें अपने घर से बेदखल किया जा रहा हो। एक इंटरव्यू में उन्होंने अपने दिल का दर्द बयां किया।

पूर्व आईपीएस ऑफिसर किरण बेदी ने जिमखाना क्लब को खाली करने के केंद्र की बीजेपी सरकार के फैसले पर फिर अपनी नाराजगी जताई है। बेदी ने कहा कि इस आदेश को सुनने के बाद उन्हें ऐसा लगा, जैसे उन्हें अपने घर से बेदखल किया जा रहा हो। एक इंटरव्यू में उन्होंने इससे जुड़ी यादें शेयर कीं और बेदखली के आदेश पर अपने दिल का दर्द भी बयां किया।
27.3 एकड़ में फैले दिल्ली जिमखाना क्लब को केंद्र सरकार की ओर से खाली करने के आदेश पर पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने दुख जताया है। 'आउटलुक' को दिए एक संक्षिप्त इंटरव्यू में उन्होंने क्लब के साथ अपने दशकों पुराने जुड़ाव को याद किया। वह बताती हैं कि कैसे उन शुरुआती मुलाकातों ने दिल्ली के साथ उनके रिश्ते को और आखिरकार इस शहर में उनके पेशेवर जीवन को आकार दिया।
अमृतसर से दिल्ली आया करती थी
किरण बेदी ने बताया कि जब मैंने पहली बार बेदखली के आदेश के बारे में सुना तो मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने अपना घर खो दिया हो। एक ऐसी जगह जहां मैं 14 साल की उम्र से खेलती हुई बड़ी हुई थी। उस समय मैं टेनिस के टूर्नामेंट खेलने अमृतसर से दिल्ली आया करती थी। उन्हीं दौरों की वजह से मुझे दिल्ली से प्यार हो गया। मैंने यह सपना देखा कि एक दिन मैं यहीं काम करूंगी और यहीं रहूंगी। और ठीक वैसा ही हुआ। 24 साल की उम्र में जब दिल्ली में मेरी पहली पोस्टिंग असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (चाणक्यपुरी) और सब-डिविजनल पुलिस ऑफिसर के तौर पर हुई तो जिमखाना क्लब मेरे ही इलाके का हिस्सा था।
दुनिया भर से चैंपियन खिलाड़ी आते थे
बेदी ने कहा कि क्लब का माहौल हमेशा मुझे गर्व महसूस कराता था। यह भारत के इतिहास, आधुनिकता और इसकी विरासत को दर्शाता था। इस क्लब में दुनिया भर से चैंपियन खिलाड़ी आते थे। मैंने वहां विंबलडन के खिलाड़ियों को देखा, डेविस कप के मैच देखे, भारी भीड़ देखी और दिल्ली की जानी-मानी हस्तियों को भी देखा।
क्लब से जुड़ी अपनी यादों के बारे में किरण बेदी ने बताया कि मैंने रामनाथन कृष्णन, जयदीप मुखर्जी, अमृतराज भाई, निरुपमा मांकड़, सुसान दास, उदया कुमार, अनु पेशावरिया और ऐसे ही कई और दिग्गजों को वहां देखा। क्लब में एशिया के कुछ बेहतरीन लॉन टेनिस कोर्ट थे और आज भी हैं। उस समय दिल्ली लॉन टेनिस एसोसिएशन कॉम्प्लेक्स बनने तक सभी बड़े अंतरराष्ट्रीय टेनिस मैच वहीं होते थे। राजनयिक समुदाय के सदस्य भी नियमित रूप से वहां खेलने आते थे।
बुजुर्ग सदस्यों के लिए दूसरा घर बन गए थे
किरण बेदी ने बताया कि यहां एक सौ साल पुराना ढका हुआ स्विमिंग पूल भी है, जहां कई बुज़ुर्ग लोग फिट रहने के लिए रोजाना तैरने आते हैं। ऐसी सुविधा बहुत कम जगहों पर मिलती है। यहां के लॉन कई बुजुर्ग सदस्यों के लिए दूसरा घर बन गए थे। वे वहां नियमित रूप से अपने दोस्तों से मिलने और सामाजिक रूप से जुड़े रहने के लिए इकट्ठा होते थे।
उन्हीं यादों को फिर से जी रही थी
उन्होंने बताया कि क्लब में शादी के रिसेप्शन के लिए लॉन भी हैं, जिनसे आमदनी होती थी। अपनी बेहतरीन जगह और आसानी से पहुंचने की सुविधा के कारण यह एक प्रतिष्ठित जगह बन गई थी। यहां तक कि प्रधानमंत्री भी कई बार यहां होने वाले कार्यक्रमों में शामिल हो चुके हैं। यहां स्क्वैश कोर्ट भी हैं, जहां से कई नेशनल चैंपियन निकले हैं। साथ ही एक जिम, सबसे बेहतरीन लाइब्रेरी और एक रीडिंग रूम भी है। जब मैंने ट्वीट किया तो मैं उन्हीं यादों को फिर से जी रही थी।
पूर्व आईपीएस ऑफिसर ने कहा कि जब मैंने 'बेदखली' शब्द का प्रयोग किया तो मुझे सचमुच ऐसा लगा जैसे मुझे उस घर से बेदखल किया जा रहा हो जिसने मेरे विकास और पहचान को आकार दिया था। अरुण जेटली ने भी कुछ साल पहले एक और खुले स्विमिंग पूल के निर्माण में मदद की थी, जिससे बच्चों को बहुत फायदा हुआ।
आश्रितों को भी सदस्यता दी जाती है
किरण बेदी ने कहा कि क्लब हमेशा से पेंशनभोगियों, वरिष्ठ नागरिकों और मध्यमवर्गीय सरकारी परिवारों के एक बड़े समुदाय की सेवा करता रहा है। यहां तक कि भोजन और बेकरी की सुविधाएं भी उचित मूल्य पर उपलब्ध थीं। उन्होंने बताया कि क्लब के इंट्री के नियम सख्त हैं। ग्रीन कार्ड के माध्यम से आश्रितों को भी सदस्यता दी जाती है। यही कारण है कि नए सदस्यों के लिए वेटिंग लिस्ट हमेशा सीमित रही है।
फैसले पर फिर से विचार करने की मांग
उन्होंने कहा कि मैं 1975 में एक महिला सदस्य के तौर पर क्लब में शामिल हुई थी। उस समय महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था। मैंने उस भेदभाव को चुनौती दी और आखिरकार नियम बदल दिए गए। लिंग-भेद को खत्म कर दिया गया। मैंने कई साल पहले क्लब काउंसिल में भी काम किया था। इससे पहले भी किरण बेदी ने एक्स पर एक ट्वीट के जरिए सरकार के इस फैसले पर दुख जताया था। उन्होंने सरकार के इस कदम को सचमुच दुखद बताया और आग्रह किया कि इस पर फिर से विचार किया जाए।
क्लब के पास 5 जून तक का समय
बता दें कि आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने हाल ही में दिल्ली जिमखाना क्लब को बेदखली नोटिस जारी किया था। मंत्रालय के अधीन आने वाले भूमि और विकास कार्यालय ने 1928 की मूल लीज डीड के क्लॉज 4 का हवाला देते हुए संवेदनशील सफदरजंग रोड क्षेत्र में रक्षा बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक सुरक्षा की जरूरत बताई है। इस क्लब के पास 5 जून तक का समय है। हालांकि, यह मामला अभी कोर्ट में है।
लेखक के बारे में
Subodh Kumar Mishraसुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।
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