अगर महिला पढ़ी-लिखी है तो भी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते; कोर्ट ने पति को हर महीने 6 हजार रुपए देने को कहा
महिला की शादी फरवरी 2013 में हुई थी, और उसका दावा है कि शादी के बाद से ही उसके पति और ससुरालवाले उसे दहेज के लिए परेशान करने लगे। उसने बताया कि गर्भावस्था के दौरान उसे ससुराल से निकाल दिया गया था, जिसकी वजह से साल 2015 से ही वह अपने बेटे के साथ अलग रह रही है।

दिल्ली की एक अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि कोई भी शादीशुदा शख्श सिर्फ बेरोजगार होने का दावा करके अपनी पत्नी और नाबालिग बच्चे के प्रति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता है। इसके साथ ही अदालत ने एक व्यक्ति को अपने बेटे के लिए 6,000 रुपए का महीने का गुजारा-भत्ता देने का आदेश दे दिया। एडिशनल सेशंस जज शीतल चौधरी प्रधान ने यह फैसला घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले में महिला की याचिका पर सुनाया। याचिकाकर्ता महिला की शादी साल 2013 में हुई थी और वह 2015 के बाद से ही अपने बेटे के साथ अलग रह रही है। अलग होने के बाद से ही पति ने उसे किसी तरह का गुजारा भत्ता नहीं दिया था।
अदालत में लगाई अपनी याचिका में महिला ने ट्रायल कोर्ट के दिए उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने उस महिला को 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण (PWDV) अधिनियम' के तहत पति से किसी भी तरह की आर्थिक मदद दिलाने से इनकार कर दिया था। अदालत ने गौर किया कि बच्चा कई सालों से पिता से किसी तरह की आर्थिक मदद पाए बिना मां की कस्टडी में रह रहा है।
'क्षमता होना और असल में कमाई होना, दो अलग-अलग बातें'
सुनवाई के दौरान जज ने पति के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि उसकी पत्नी को मदद पाने का अधिकार नहीं है क्योंकि वह पढ़ी-लिखी है। कोर्ट ने कहा, 'कमाई करने की क्षमता होना और असल में होने वाली कमाई, ये दोनों अलग-अलग बातें हैं।' कोर्ट ने कहा कि पति ऐसा कोई ठोस सबूत भी अदालत के सामने पेश नहीं कर पाया जिससे यह साबित होता हो कि महिला अपना और बच्चे का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त कमाई कर रही थी।
कोर्ट ने माना- महिला का पति शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति है
मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने माना कि महिला का पति शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति है और साथ ही गुजारा-भत्ता देने में भी सक्षम है, ऐसे में अदालत ने उसे आदेश दिया कि वह बच्चे के बालिग होने तक उसके भरण-पोषण के लिए हर महीने 6 हजार रुपए का भुगतान करे।
'बहाने बनाकर अपनी जिम्मेदारियों से नहीं भाग सकता'
2 जून को पारित किए अपने आदेश में अदालत ने कहा, ‘प्रतिवादी/पति अपने नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण के लिए समान रूप से जिम्मेदार है। अपने खर्चों का प्रबंधन करना उसकी जिम्मेदारी है और सिर्फ यह कहकर कि वह बेरोजगार है या उस पर दूसरी जिम्मेदारियां हैं, ऐसे बहाने बनाकर वह अपनी कानूनी रूप से ब्याही पत्नी और नाबालिग बेटे का भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।’
कई मौके देने पर भी पति ने आय का हलफनामा दाखिल नहीं किया
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी पाया कि ट्रायल कोर्ट में कई बार मौका दिए जाने के बावजूद पति ने अपनी आय का हलफनामा दाखिल नहीं किया था। कोर्ट ने कहा, 'हमारा मानना है कि पति इस आदेश की तारीख से लेकर नाबालिग बेटे के बालिग होने तक उसे 6,000 रुपए महीने का गुजारा-भत्ता देने में सक्षम है।' इसके साथ ही कोर्ट ने अपने पिछले आदेश में बदलाव करते हुए अपील को आंशिक रूप से मंजूर कर लिया।
'शादी के बाद से ही दहेज के लिए प्रताड़ित करने लगा पति का परिवार'
महिला ने आरोप लगाया था कि फरवरी 2013 में शादी के बाद, उसके पति और उसके परिवार के सदस्यों ने उसे दहेज के लिए परेशान किया, शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया और मानसिक रूप से क्रूरता की। उसने दावा किया कि गर्भावस्था के दौरान उसे ससुराल से निकाल दिया गया था और वह 2015 से अपने बेटे के साथ अलग रह रही है।
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, 2015 में फैमिली कोर्ट में हुए समझौते के बाद यह जोड़ा कुछ समय के लिए साथ आया था और कुछ महीनों तक किराए के मकान में साथ भी रहा था, लेकिन एकबार फिर रिश्तों की पटरी नहीं बैठ पाने के बाद ये दोनों फिर से अलग हो गए थे।
पिछले साल ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दी थी महिला की अपील
ट्रायल कोर्ट ने सितंबर 2025 में महिला की शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि वह DV एक्ट के तहत घरेलू हिंसा और आर्थिक शोषण के आरोपों को साबित करने में विफल रही। हालांकि अपीलीय अदालत ने इस बात से सहमति जताई कि शारीरिक हमले और क्रूरता के आरोपों की पुष्टि मेडिकल रिकॉर्ड या स्वतंत्र सबूतों से नहीं हुई थी, लेकिन उसने पाया कि पति 2015 से बच्चे की आर्थिक मदद करने में विफल रहा था।
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