गुरुग्राम एनकाउंटरः मारे गए 3 बदमाश इकलौते बेटे थे, परिवार बोला- आपराधिक रिकॉर्ड नहीं तो गोली क्यों मारी
गुरुग्राम में मुठभेड़ में मारे गए 4 शूटरों में से 3 अपने-अपने घर के इकलौते बेटे थे। परिजनों ने सवाल उठाया है कि जिन बच्चों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था, उन्हें गोली क्यों मारी गई। उन्होंने कहा कि असली गैंगस्टरों को पकड़ने में नाकाम रही पुलिस बिना आपराधिक इतिहास वाले बच्चों का एनकाउंटर कर रही है।

गुरुग्राम में मुठभेड़ में मारे गए शूटरों के परिजनों ने पुलिस की पूरी कार्रवाई को कटघरे में खड़ा किया है। उनका आरोप है कि पुलिस असली और बड़े गैंगस्टरों को पकड़ने में पूरी तरह नाकाम है। अपनी नाकामी छिपाने के लिए ऐसे गैंगस्टरों द्वारा बहकाए गए नादान और बिना आपराधिक इतिहास वाले बच्चों का एनकाउंटर किया जा रहा है।
रोहतक के भालोट गांव के रहने वाले तीन युवक अंकित, आर्यन और नितिन-अपने माता-पिता के इकलौते बेटे थे। बुधवार को घर से बेहद सामान्य तरीके से निकले इन युवाओं की शुक्रवार सुबह मौत की सूचना मिलने पर वह काफी परेशान हैं।
परिजनों का सवाल है कि जिन बच्चों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था, वे रातों-रात गुरुग्राम कैसे पहुंच गए और पुलिस ने उन्हें जिंदा पकड़ने के बजाय सीधे गोली क्यों मारी? । परिजनों ने कहा कि वह बच्चो को एक अवसर जरूर देना चाहिए था। वहीं, रोहतक के भालोट गांव के तीन घरों के चिराग एक साथ बुझने से काफी गमगीन है।
जेवलिन खिलाड़ी है आर्यन
12वीं कक्षा का छात्र आर्यन अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था और उसकी सिर्फ चचेरी बहन है। आर्यन पिछले दो साल से जेवलिन थ्रो (भाला फेंक) का नियमित अभ्यास कर रहा था। बुधवार को वह ग्राउंड से लौटा और खेल की थकान मिटाने के लिए आइस बाथ (बर्फ के पानी से स्नान) लेने की बात कहकर निकला। आर्यन का मोबाइल बंद आने पर पिता प्रदीप ने तुरंत पुलिस को सूचना दी, लेकिन पुलिस ने जल्द ही गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करने की बात कहकर लौटा दिया।
पहले झूठे केस में फंसाया
तीसरे युवक नितिन के पिता संजय ने पुलिस प्रशासन पर आरोप लगाए हैं। संजय का कहना है कि पुलिस ने नितिन को पहले भी एक होटल से उठाकर पुलिस पर फायरिंग के झूठे केस में फंसाया था, जिसमें वह नौ महीने जेल में रहा। पांच महीने पहले हाईकोर्ट से जमानत पर बाहर आने के बाद नितिन ने अपनी जिंदगी सुधारने के लिए बाइक ठीक करने की दुकान खोल ली थी। बुधवार को वह भी बिना बताए गायब हो गया। परिवार ने पुलिस को सूचना दी।
मां से कहा था- कांवड़ लेने जा रहा हूं
17 साल के अंकित के पिता अनिल अमूल कंपनी में ठेकेदार के अधीन मजदूरी करते हैं। अंकित परिवार का इकलौता बेटा था और चार बहनों का अकेला भाई थी। आठवीं के बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी थी और दिहाड़ी मजदूरी कर पिता का हाथ बंटाता था। बुधवार को उसने अपनी मां से कहा था, मैं दोस्तों के साथ हरिद्वार कांवड़ लेने जा रहा हूं। पिता के अनुसार अंकित का कभी कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा।
लेखक के बारे में
Subodh Kumar Mishraसुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।
ज्यादातर नेशनल और स्टेट डेस्क पर काम करने का अवसर मिलने के कारण राजनीतिक और सामाजिक विषयों से जुड़ी खबरों में दिलचस्पी बढ़ती गई। कई लोकसभा और विधानसभा चुनावों की खबरों की पैकेजिंग टीम का हिस्सा रहने के कारण भारतीय राजनीति के गुणा-भाग को समझने का मौका मिला।
शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो सुबोध ने बीएससी (ऑनर्स) तक की अकादमिक शिक्षा हासिल की है। साइंस स्ट्रीम से पढ़ने के कारण उनके पास चीजों को मिथ्यों से परे वैज्ञानिक तरीके से देखने की समझ है। समाज से जुड़ी खबरों को वैज्ञानिक कसौटियों पर जांचने-परखने की क्षमता है। उन्होंने मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। इससे उन्हें खबरों के महत्व, खबरों के एथिक्स, खबरों की विश्वसनीयता और पठनीयता आदि को और करीब से सीखने और लिखने की कला में निखार आया। सुबोध का मानना है कि खबरें हमेशा प्रमाणिकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए। सुनी सुनाई और कल्पना पर आधारित खबरें काफी घातक साबित हो सकती हैं, इसलिए खबरें तथ्यात्मक रूप से सही होनी चाहिए। खबरों के चयन में क्रॉस चेकिंग को सबसे महत्वपूर्ण कारक मानने वाले सुबोध का काम न सिर्फ पाठकों को केवल सूचना देने भर का है बल्कि उन्हें सही, सुरक्षित और ठोस जानकारी उपलब्ध कराना भी है।


