प्रवासी मजदूर 450 रुपये किलो भरवा रहे छोटे सिलेंडर, पलायन की तैयारी

Newswrap हिन्दुस्तान, गुड़गांव
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- एक महीने में 80 रुपये से 450 रुपये किलो पहुंची गैस की कीमत प्रवासी मजदूर 450 रुपये किलो रहे छोटे सिलेंडर, पलायन

प्रवासी मजदूर 450 रुपये किलो भरवा रहे छोटे सिलेंडर, पलायन की तैयारी

•सोहना, संवाददाता। शहर में रसोई गैस की कालाबाजारी ने रोजी-रोटी कमाने आए प्रवासी मजदूरों के सामने पेट भरने का बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। पांच किलोग्राम वाले छोटे सिलेंडरों में गैस भरवाना अब मजदूरों की जेब पर भारी पड़ रहा है। जो गैस एक महीने पहले तक 80 से 100 रुपये प्रति किलो मिल रही थी, वह अब 400 से 450 रुपये प्रति किलो की दर से बेची जा रही है। हालात यह हैं कि एक किलो गैस की कीमत मजदूर की एक दिन की दिहाड़ी के बराबर हो गई है। महंगाई की इस मार से परेशान होकर मजदूर अब अपने पैतृक राज्यों की ओर पलायन करने की तैयारी करने लगे हैं।

राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश से सोहना आए इन मजदूरों के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना अब एक बड़ी चुनौती बन गया है।मकान मालिकों की पाबंदी, खुले आसमान के नीचे पक रहा भोजनगैस महंगी होने के कारण जब मजदूरों ने लकड़ी वाले चूल्हे और कोयले की भट्टी का सहारा लेना चाहा, तो किराए के मकानों के मालिकों ने उस पर भी सख्ती से रोक लगा दी। मकान मालिकों का तर्क है कि धुएं से दीवारें काली होती हैं और बंद कमरों में आगजनी या दम घुटने जैसी जानलेवा घटनाओं का खतरा रहता है। इस पाबंदी के कारण मजदूर अब किराए के मकान से बाहर, रास्तों या खाली प्लॉटों में ईंटों का अस्थाई चूल्हा बनाकर खाना पकाने को मजबूर हैं।गांव लौट जाएंगे, कम से कम चूल्हे पर पेट तो भरेंगेगैस के आसमान छूते दामों और रोजमर्रा की मुश्किलों के बीच प्रवासी मजदूरों का दर्द अब छलकने लगा है। राजस्थान निवासी गोवर्धन ने बताया कि अगर यही हालात रहे तो अपने घर लौट जाएंगे। वहां गैस नहीं मिलेगी तो कम से कम चूल्हे पर खाना बनाकर अपना और परिवार का पेट तो आसानी से भर लेंगे। वहीं मध्य प्रदेश निवासी कलावती ने बताया कि मकान के अंदर चूल्हा जलाने की मनाही है। इसलिए हम किराए के मकान के बाहर आम रास्ते में अपना छोटा तंदूर जलाकर सुबह-शाम का खाना बनाने को मजबूर हैं। राजस्थान निवासी शिवानी ने बताया कि दिनभर मजदूरी करने के बाद शाम को पहले लकड़ियां बीनकर लानी पड़ती हैं, फिर खाली प्लॉट में ईंटों का चूल्हा बनाकर खाना पकाते हैं। सबसे ज्यादा तकलीफ रात में होती है, जब छोटे बच्चों को भूख लगती है और दूध गर्म करने का कोई साधन पास नहीं होता।

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